भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

कथम स्वरूप

१—ब्रह्म-वन्दना

य आत्मदा यलदा यस्य विस्व, उपासते, प्रशिवं यस्य देवाः। यस्यच्छायाऽमृतं यस्य मृत्युः, कस्मै देवाय हविषा विधेम।

( यजु० ४० २५ स० १२ )

जो आत्मज्ञान तथा शाारीरिक बल का देने वाला है—जिस की सभी लोग उपासना करते हैं—विद्वान् पुरुष जिसे प्राप्त करते हैं—जिसका आश्रय अमृत ( हीर्य जीवन ) देने वाला है, और जिसके अधिकार में मृत्यु है—हम उस दिव्य स्वरूप का ध्यान करते हैं। किसी भी महत्वपूर्ण कार्य के प्रारम्भ में उस की समाप्ति के लिये, वन्दना एक आवश्यक तथा शिष्टाचार से सम्बन्ध रखने वाला वैदिक नियम है। अतः हमने भी इस आर्य-धर्म सम्बन्धी ग्रन्थ को उपादेय बनाने की इच्छा से भावूलिक आर्थना की है। अस्तु।