भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विधान

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ऊपर के मन्त्र में ईश्वर-विनय तो हुई है, पर हमारे विचार से इसमें 'ब्रह्मचर्य' की ओर गुप्त रूप से सङ्केत भी किया गया है। उसका आशय निम्न-लिखित है:—

ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य का मानसिक ज्ञान स्फुरित होता है। उसके शारीरिक बल का भी सर्वोत्कृष्ट साधन ब्रह्मचर्य ही है। सभी लोग ब्रह्मचर्य को श्रेष्ठ मान कर उसकी प्रतिष्ठा करना चाहते हैं। बुद्धिमानों को ब्रह्मचर्य अत्यन्त प्रिय होता भी है। ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य दीर्घायु प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य दूर भगाई जा सकती है। इसलिये इस पवित्र वैदिक प्रार्थना में कहे गये 'ब्रह्मचर्य-रूप भगवान्' को हृदय में धारण करना योग्य है !

२—ब्रह्मचर्य की व्याख्या

'ब्रह्मचर्य' के सम्बन्ध में कुछ विचार प्रकट करने से पहले, यह समझना देना अत्यन्त आवश्यक है कि ब्रह्मचर्य है क्या पदार्थ ? जब तक इसके अर्थ नहीं बताये जायेंगे, तब तक उसके गूढ़ भावों के समझने और समझाने में, पाठक और लेखक—दोनों को समान रूप से अनुविधा होगी।

एक बात यह भी है कि जो वस्तु व्याख्या-द्वारा पहले पहल स्पष्ट नहीं कर दी जाती, उसके विषय में किये गये विचार भली भाँति हृदयङ्गम नहीं किये जा सकते। अतः 'ब्रह्मचर्य' किये कहते हैं ? यह वतलाना होगा।

वास्तव में 'ब्रह्मचर्य' एक शब्द नहीं, यह दो शब्दों के योग से बना है। एक 'ब्रह्म' दूसरा 'चर्य'—इस प्रकार तो ब्रह्म और चर्य—