भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य को व्याख्या

इन दोनों शब्दों के भिन्न-भिन्न स्थानों पर, अनेक अर्थ होते हैं। हम पाठकों के हितार्थ कुछ को नीचे लिख देते हैं:—

‘ब्रह्म’—इस शब्द से ईश्वर, वेद, वीर्य, मोक्ष, धर्म, सूर्य, ब्राह्मण, गुरु, सुख, योग, सत्य, आत्मा, मनः, अन्न, द्रव्य, जल, महत्व, साधन और ज्ञान आदि का, और ‘चर्य’—इस शब्द से चिन्तन, अध्ययन, रक्षण, विवेचन, सेवा, नियम, उपाय, हित, ध्येय, प्रगति, प्रसार, संयम, साधना और कार्य आदि का बोध होता है।

‘ब्रह्मचर्य’ बहुत प्राचीन एवं प्रभावोत्पादक शब्द है। इसके बहुत से अर्थ हो सकते हैं, जिन्हें हम ऊपर दे चुके हैं, पर हमारे वैदिक साहित्य में इसके तीन ही प्रधान अर्थ होते हैं। हमने जहाँ कहाँ देखा है, इन्हीं तीनों अर्थों को ध्यान में रख कर, इस शब्द का प्रायः व्यवहार हुआ है। प्रायः उन्हीं अर्थों को लक्ष्य में रख कर, हमारा यह ग्रन्थ भी लिखा जा रहा है। अतएव हम उन्हीं प्रयुक्त नीचे स्पष्ट कर देते हैं:—

‘ब्रह्म’ शब्द वीर्य, वेद और ईश्वर वाचक है। और ‘चर्य’ रक्षण, अध्ययन तथा चिन्तन का चोत्तक है। इस प्रकार ब्रह्मचर्य के ये तीन प्रधान अर्थ समझे जाने चाहिये। १—वीर्य-रक्षण, २—वेदाध्ययन और ३—ईश्वर-चिन्तन। प्रयुक्त-प्रयुक्त तो तीन अर्थ हुये, पर तत्त्वतः वे तीनों ही एक मूलभूत ‘ब्रह्मचर्य’ में सञ्जित हैं।

‘ब्रह्मचर्य’ का पहला अर्थ हमने ‘वीर्य-रक्षण’ किया है। यह अर्थ प्राचीन समय से जनता में रुढ़ि को प्राप्त हो गया है। ब्रह्मचर्य का नाम लेते ही लोगों के हृदय में वीर्य-रक्षण का भाव उठता है। यह साधन-रूप से अब भी संसार में प्रतिष्ठित है।

‘ब्रह्मचर्य’ का दूसरा अर्थ हमने ‘वेदाध्ययन’ किया है। यह