ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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भोग की तृष्णा
देश में अच्छे पुरुषों का भोग अभाव है। उतरे लोगों के सङ्ग में पड़ कर बालक अपने को नष्ट-ध्वष्ट कर डालते हैं। उनके माता-पिता और गुरु भी उनकी कुसङ्ग से रक्षा नहीं कर सकते। इस लिये सुबोध लोगों का कर्तव्य है कि वे बालक बालिकाओं की दुश्चिन्ता और कुसङ्ग से पूर्ण रूप से रक्षा करें।
५—भोग की तृष्णा
“भोगे रोग-भयम्।”
भोग में रोग होने का भय रहता है।
“भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः।”
( भर्तृहरि-शतक )
हम भोगों को नहीं भोग सके, प्रत्युत भोगों ने हमें ही नष्ट कर डाला।
इस संसार में मनुष्य वृद्धा विचित्र जीव है। वह ज्ञानवान् होने पर भी अपनी अज्ञानतावश भोगों में अतुरक्त रहता है। वह समझता है कि इसमें सुख है। अपनी तृष्णा को पूरी करने के लिये सर्वत्र लालायित रहता है। वह चाहता है कि इस भोग्य वस्तु को अधिकता से भोगने से मनोवृत्ति की शान्ति होगी, पर इसका विपरीत ही परिणाम होता है। अज्ञान के शिथिल हो जाने पर भी तृष्णा की शान्ति कदापि नहीं होती।
अहं नालितं पलितं सुषुम्नम् । दन्तविहीनं जातं तुषुम्नम् ॥