ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रज्ञाचर्य-विज्ञान
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कर धृत कम्पित शोभित दण्डम् । तदपि न मुञ्चत्याशा भगवद्भम् ॥
( साहसार्थ )
अङ्ग शिथिल पड़ जाते हैं, सिर हिलने लगता है, मुख में दौत नहीं रह जाते और हाथ में लाठी लेकर कौपते हुये चलते हैं । फिर भी पुरुष की एक न एक प्रकार की आशा बनी ही रह जाती है ।
इससे यह बात विदित होती है कि बुद्धता में भी तृष्णा का नाश नहीं होता । अतएव जो पुरुष भोग के भोगने की चेष्टा करता है, वह वास्तव में मृदुता करता है । भोगों के भोगने से आज तक किसी की न इच्छा पूरी हुई, और न हो सकती है । मनुष्य की इच्छायें इतनी चलबती हैं कि वे कभी तुष्ट नहीं होती हैं, वरन् दिन पर दिन बढ़ती जाती हैं ।
प्राचीन समय में यथाति नाम के एक राजा थे । वे किसी शापवशा जुवावस्था में ही बुद्धता को प्राप्त हो गये थे । पर चनकी भोगेच्छा नहीं गई । तब उन्होंने अपने सब लड़कों को बुलाकर पूछा कि हमें कौन अपनी जवानी देगा ?
इस पर सब से छोटे लड़के के अतिरिक्त सभी ने अपने पिता की याचना को अस्वीकार कर दिया । इसलिये यथाति ने बस्ती की अपनी बुद्धता देख कर तरुण ताली और बहुत दिनों तक भोग में लगे रहे । अन्त में उन्होंने इस प्रकार अपने मन के उद्धार प्रकट किये :—
न जातु कामः कामानाजुपभोगेन शाम्यति । द्विषाण् कृष्ण वस्त्रम्, भूय पद्मभिर्वर्धते ॥