ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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भोग की तुल्या
काम-वासनाओं की शान्ति उनके भोगने से कदापि नहीं होती, बल्कि उनकी वृद्धि होती जाती है। अग्नि में हृष्य पदार्थ के डालते रहने से उसकी ज्वाला बढ़ती ही जाती है। वह कभी घट नहीं सकता।
यत्पृथिव्यां ब्रह्मि यथं, हिरण्यं पशवः स्त्रिवः ।
एकस्यापि न पर्याप्तं, तस्मात्सृष्णां परित्यजेत् ॥
संसार में जितने अन्न, सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, एक पुरुष के भोगने के लिये भी पर्याप्त नहीं हैं। इसलिये तृष्णा को छोड़ देना चाहिये।
या दुःस्थया दुर्मतिभिर्नजीर्यति सुजीर्यतः ।
योऽसौ प्राणात्तिकारोगास्तां तृष्णां त्यजेतः सुखी ॥
जो मूर्ख पुरुषों से छोड़ी नहीं जा सकती, जो जीर्ण हो जाने पर भी जीर्ण नहीं होती और जो प्राणों का नाश करने वाली व्याधि है—उस तृष्णा को छोड़ने से ही मनुष्य सुखी हो सकता है।
यह कह कर उन्होंने अपने पुत्र से पुनः दृष्टता ले ली और बहुत प्रकाश से आशीर्वाद दे कर उसे विदा किया।
अब पाठकों को यह इस आख्यायिका से शिक्षा लेनी चाहिये कि विषय-भोग में सुख नहीं। इसमें पड़ना मूर्खता है। इससे जो लोग पशुपत्र की भाँति जल से न्यारे रहते हैं, वे ही सत्पुरुष हैं। वास्तवमें ब्रह्मचर्य ही सुख-शान्ति का देने वाला है, जिसके मनमें इसके प्रति आदर है, वह भोग रूपी दोगोंमें पड़कर अपना जीवन नाष्ट नहीं कर सकता।