भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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मनुष्य-विज्ञान

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६—दुराचार की निन्दा

वज्रोद्विषो यो विषयातुरागी । कावा विमुक्तिं विषये विरक्तिः ॥

(प्रसन्नोदरी)

कौन बंधा हुआ है ? वह, जो विषयों में लीन है। और कौन छूटा हुआ है ? वह जो विषयों से अतिस है।

मनुष्य ज्ञान-प्रधान प्राणी है। उसे कर्मों की नीचता और उच्चता का स्वयं ज्ञान होता है। पर वह अपनी तामसी बुद्धि के कारण ऊपर चढ़ने की अपेक्षा, नीचे जाने में विशेष रुचि रखता है। इसी से वह पतन के गत में गिरता ही जाता है। यदि वह इस दुर्गुण को दवादे, तो वह पापों से मुक्त हो सकता है। वह यह जानता है कि पाप का फल विप के समान होता है, जो दुष्कर्मों को अवश्य मिलता है, पर अध्यानता और प्रमाद-वश उसी ओर बढ़ता है। सत्य कहा गया है:—

“पोत्वा मोहमयी प्रमादमदिरा, सुन्मत्त भूतं जगत्।”

संसार मोहमयी सदिरा को पीकर उन्मत्त हो रहा है।

उन्मत्तता की दशा में मनुष्य की बुद्धि अष्ट हो जाती है। उसे दुरे-भले का ज्ञान नहीं रह जाता। इसी से वह असावधानी करता है, और उससे होने वाले कष्ट फल को चखता है। पर जब उसे स्वयं ज्ञान होता है, तब उसे अपनी करनी पर पश्चा-ताप होता है। वह अपने मन में इस बात की प्रतिष्ठा करता है कि अब मैं मूल कर के भी ऐसे दुष्कर्मों में न फसूंगा। यदि इसी भाँति छूटा रही, तो वह सुधर भी जाता है, पर बहुत कम लोग ऐसे हैं, जो अपने को इस दुराचार के हाथसे बाहरकर सकते हैं।