ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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दुराचार-की निन्दा।
दुराचार से बढ़ कर मनुष्य का संसार में दूसरा अहित नहीं ! जो इसका अनुयायी हुआ, उसको अपने जीवन से हाथ धोना पड़ता है । यह उस राक्षस के समान है, जो जीते जी शरीर के सब रक्त को पी जाता है । यह मनुष्य के भीतर है, पर इसको न दृष्टाते रहने से यह मनुष्य का सर्वनाश कर के ही रहता है । दुराचार आदि में प्रिय और अन्त में अग्रिय होता है । इसीलिये मनुष्य भ्रमवश उसके लोभ में पड़ जाता है ।
देखिये, इस विषय में धर्माचार्य मनु क्या कहते हैं :—
दुराचारोहि पुरुषो, लोके भवति निन्दितः । दुःख-भागौ च सततं, व्यापितोऽहपायुरेव च ॥
दुराचारी मनुष्य संसार में निन्दा का पात्र, सदा दुखी, रोग-भस्त और अत्यायु होता है ।
वास्तव में पाप धीरे-धीरे बढ़ कर दुराचारी को मूल से नष्ट कर देता है । द्वार पर में यहु-वंशियों की सत्ता बहुत बढ़ गई थी । श्री कृष्ण के कारण वे दिन पर दिन उन्नत होते गये, पर जब उनकी शिलाओं का लोप होने लगा, वे लोग दुराचारी हो गये । कहा जाता है कि उनकी संख्या ५६ कोटि थी । उनमें मदिरा, भांस और मेश्रुत के दुर्जन्यसेन घुस गये । फिर ऐसा विमष्ट हुआ कि वे आपस में लड़ कर मर गिटे ।
दुराचारी पुरुष स्वयं अपने क्रूरता का फल भोगता है । भ्रायः सभी सदुग्रन्थों में दुराचार की निन्दा की गई है, और इससे पृथक् रहने का आदेश किया गया है । अतएव जो लोग आत्म-कल्याण चाहते हैं, वे प्रयत्न-पूर्वक दुराचार से पृथक् रहें ।
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