भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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मध्यचर्य-विधान

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यदि हृदय में अह्मचर्य के प्रति श्रद्धा है, तो दुःखानार से बँचना कोई कठिन काम नहीं।

७—काम-शमन के उपदेश

शरान्महाशयस्तमोस्ति कोऽषा । मनोजवाणैर्व्यथितो न यस्तु ॥

(शंकराचार्य)

शूरों में भी महाशूर कौन है ? वह पुरुष जो कामदेव के वार्यों से न्यथित न हुआ हो।

वास्तव में कामदेव का दीक्षण बाण सहना कठिन काम है। जो उसके वार्यों को खा कर स्थिर चित्त रह जाय, उसे ही महाशूर कहना चाहिये। महाराज भरतहरि कहते हैं:—

मत्तैभक्तुम्भदलने भुवि सन्ति शूराः।

केचित् प्रमत्त मृगराज-वधेऽपिदद्वाः॥

किन्तु प्रवीणि बलिनां पुरतः प्रसन्नाः।

कन्दर्प-दर्प-दलने विरला भद्रुष्याः॥

मतवाले हाथी के मस्तक को बिदीर्य करने वाले शूर तो संसार में बहुत से हैं—कोई-कोई ऐसे भी हैं, जो क्रोधित सिंह को भी मारने में निपुण हैं, किन्तु मैं बड़े-बड़े चली लोगों के सामने ललकार कर कहता हूँ कि कामदेव के दर्प को चूर्ण करने वाले-थिरले ही पुरुष होते हैं !

यद्यःवात बहुत ही सत्य है। विकारों के नाश करने वाले पुरुषों की संख्या संसार में बहुत कम होती है। पर ऐसी नात