ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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काम-शमन के उपदेश
नहीं कि है ही नहीं। हमारे विचार से काम-वासनाओं का नाश करना कोई असम्भव बात नहीं। आज तक अनेक ऐसे प्रातःस्मरणीय पुरुष हो गये हैं, जिन्होंने काम-विकारों को अपनी इच्छा के अनुकूल करके उससे लाभ उठाया है।
यह संसार बड़ा विचित्र है। यहाँ कोई वस्तु निर्गुण या निर्दोष नहीं है। विद्वान् पुरुष विष से भी अमृत का काम ले सकता है तथा मूर्ख अमृत को भी दूषित विष कर सकता है। कोई पातक ऐसा नहीं, जिसका प्रायश्चित्त न हो, कोई दोष ऐसा नहीं, जिसकी शान्ति न हो—कोई रोग ऐसा नहीं, जिसकी चिकित्सा न हो, और कोई विकार ऐसा नहीं, जिसको दूर करने का सपाथ न हो !
काम-विकारों के उत्पन्न होने का स्थान हृदय और मस्तिष्क है। यहीं से ये मनत-चिन्तन द्वारा उद्भूत होकर सर्वोच्च में उचो-जना प्रकट करते हैं। जब सारे शरीर में गुप्त रूप से इनका प्रभाव हो जाता है, तब भला लिङ्गन्दिग्य कैसे बँच सकता है ? और इसमें विकार होते ही मैथुन के लिये लोग वाञ्छ्य होते हैं। अन्त में इनका प्रभुत्व बढ़ता ही जाता है, जो किसी न किसी रूप में वीर्य-नाश का प्रधान कारण होता है। हमारा विचार है कि जैसे ही मनी-वृत्तियों में विकार उत्पन्न होने लगे, वैसे ही इसका रोकना श्रेयस्कर है, अतएव हृदय तथा मस्तिष्क को संयमित करने के उपायों से ही इनको अपने हुक्मनों से रोकना जा सकता है।
अब हम काम-विकारों को रोकने के कुछ अत्यन्त उपयोगी और अनुपम नियमों का वर्णन करते हैं। जिस समय मन में विकार चढने लगे, निम्नलिखित क्रियायें अत्यन्त उपयोगी हैं:—