ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंशास्त्रार्थ-विज्ञान
३००
१—शीतल जल से शिर को तब तक धोते रहना, जब तक चित्त स्थिर न हो जाय ।
२—बूछ्छा से अधिक ठंडा जल पी लेना चाहिये ।
३—किसी खट्टे फल को अनिच्छा होते हुये भी खा लेना हितकर है ।
४—नदी समीप हो, तो उसमें शरीर मल-मल कर खूब स्नान कर लेना ।
५—आधा या पाव कोस तक दौड़ जाना या दानों कानों को खूब मलाना ।
६—१५, २० मिनट तक शीघ्रता से श्वास-प्रश्वास लेना ।
७—रमशान-भूमि को देखना या वहाँ की गति का स्मरण करना ।
८—आश्रयजनक या कीर्तुहल-वर्धक ग्रन्थ पढ़ने लगना ।
९—संसार की असारता और अपने त्वर शरीर से घृणा करना ।
१०—परमेश्वर के ध्यान और स्मरण में लग जाना ।
ऊपर लिखे किसी भी उपाय का यथा विधि अवलम्बन करने से क्राम-विकारों का निश्चयपूर्वक नाश हो सकता है—ये कई सज्जनों के अनुभूत उपाय हैं ।
८—स्वास्थ्य की शिल्पार्थ
प्रसिद्ध डा० डिफोरनेट ने स्वस्थ रहने के सर्वोच्च १० उपाय बतलाये हैं । अमेरिका की कई सभाओं में एक डाक्टर