भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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शास्त्रार्थ-विज्ञान

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१—शीतल जल से शिर को तब तक धोते रहना, जब तक चित्त स्थिर न हो जाय ।

२—बूछ्छा से अधिक ठंडा जल पी लेना चाहिये ।

३—किसी खट्टे फल को अनिच्छा होते हुये भी खा लेना हितकर है ।

४—नदी समीप हो, तो उसमें शरीर मल-मल कर खूब स्नान कर लेना ।

५—आधा या पाव कोस तक दौड़ जाना या दानों कानों को खूब मलाना ।

६—१५, २० मिनट तक शीघ्रता से श्वास-प्रश्वास लेना ।

७—रमशान-भूमि को देखना या वहाँ की गति का स्मरण करना ।

८—आश्रयजनक या कीर्तुहल-वर्धक ग्रन्थ पढ़ने लगना ।

९—संसार की असारता और अपने त्वर शरीर से घृणा करना ।

१०—परमेश्वर के ध्यान और स्मरण में लग जाना ।

ऊपर लिखे किसी भी उपाय का यथा विधि अवलम्बन करने से क्राम-विकारों का निश्चयपूर्वक नाश हो सकता है—ये कई सज्जनों के अनुभूत उपाय हैं ।

८—स्वास्थ्य की शिल्पार्थ

प्रसिद्ध डा० डिफोरनेट ने स्वस्थ रहने के सर्वोच्च १० उपाय बतलाये हैं । अमेरिका की कई सभाओं में एक डाक्टर