भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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स्वास्थ्य को शिखार्ये

सहोदय को पुरस्कार भा इसके कारण मिल चुके हैं। हम उन्हें नहीं देते हैं:—

(१) वायु-सेवन—बहुत सवैरे ठठकर, टहलने को जाना और सब दिन परिश्रम करना।

(२) श्वास-प्रश्वास—पानी और रोटी से जीवनो शक्ति बढ़ती है। नीरोगता के लिये शुद्ध वायु और सूर्य-किरणों की बड़ी आवश्यकता है।

(३) आचार-उदार—धीर्घ जीवन के लिये परिमित आचार और थोड़ा आहार ही सबसे उत्तम है।

(४) शारीरिक स्वच्छता—जैसे स्वच्छ किया हुआ यन्त्र अधिक दिनों तक चलता है, वैसे ही शरीर भी स्वच्छता से नीरोग रहता है।

(५) उचित निद्रा—निद्रा शरीर को फिर से शक्ति प्रदान कर देती है। बहुत पड़े रहने से दुर्बलता आती है।

(६) वस्त्र-व्यवहार—शीत और गर्मी से शरीर की रक्षा के लिये ऐसे कपड़े हों, जिनसे चलने-फिरने में रुकावट न हो।

(७) रहने का घर—बहुत स्वच्छ और खुला हुआ हो; वायु और प्रकाश के पहुँचने योग्य हो।

(८) नैतिक स्वास्थ्य—आमोद-प्रमोद से मन अवश्य प्रसन्न होता है, पर इसकी अधिकता से शरीर-शुद्ध ईर्ष्या से उत्तेजित होकर, मनुष्य को पाप की ओर ले जाते हैं।

(९) मानसिक श्रवस्था—मन की प्रसन्नता स्वस्थता को बढ़ाती है किन्तु दुःख और विपाद से असमय में दुष्टता प्राप्त होती है।