भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 305, कुल 380 में से

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प्रहारचर्य-विज्ञान

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(१०) परिश्रम—केवल मस्तिष्क-परिश्रम से ही काम नहीं चलता। शारीरिक श्रम करने से ही आहार मिलता और परिपाक होता है।

वयोवृद्ध नेता दादाभाई नौरोजी ८६ वर्ष के होने पर भी हृष्ट-पुष्ट, प्रसन्न-सुख तथा स्वस्थ रहते थे। एक समाचार-पत्र के ख़ामो के पृष्ठाने पर उन्होंने इसके जो कारण और स्वास्थ्य सम्बन्धी नौ नियम बतलाये, वे भी नीचे दिये जाते हैं:—

मैंने आज तक एक दिन भी सदिया पान नहीं किया। मैंने मांस का स्पर्श तक नहीं किया है। मैंने कभी तम्बाखु नहीं पिया, नहीं खाया और नहीं सूँघा। मैंने कभी भी अधिक मिर्चों का चटपटा भोजन नहीं किया है। मैं वासी भोजन से बँचता आया हूँ। मैं अब तक समीरुण्य के पास नहीं गया अर्थात् क्रोध में भर कर गाली-गलौज या मार-पीट नहीं की। मैंने सदा परिश्रम के साथ अपने और दूसरों के बहुत से काम किये हैं। मैंने प्रत्येक काम नियम से किये हैं।

१—केवल स्थूल शरीर का नीरोग रहना ही सच्चा आरोग्य नहीं है। स्थूल और सूक्ष्म, दोनों शरीर विकास-रहित होने चाहियें।

२—शरीर, मन और आत्मा—इन तीनों की, जिसमें आगे की वरावर चन्तति होती चली जाय, ऐसा काम करना आरोग्य का सच्चा नियम है।

३—आरोग्य रहने के लिये केवल सुख से खा-पी लेना ही पर्याप्त नहीं है, किन्तु सदगुणों में प्रवृत्ति रखनी चाहिये, जिससे क्ती आयु बढ़े।

४—स्थूल और सूक्ष्म, इन दोनों शरीरों का परस्पर संम्बन्ध है। इन दोनों में एक के बिना दूसरा नहीं ठहर सकता। स्थूल

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