ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 307, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तम स्कन्ध
१—ब्रह्म-वन्दना
ॐ तेजोऽस्ति तेजो मयि धेहि, वीर्यं मस्ति वीर्यं मयि धेहि । वल मस्ति वलं मयि धेहि, शोडोऽस्योजो मयि धेहि । मन्त्र्युरस्ति मन्त्र्यु मयि धेहि, सहोऽस्ति सहो मयि धेहि ।
( यजु० श्र० १६ म० ६ )
हे प्रभो ! तुम तेज हो—हमें तेज प्रादान करो ! तुम वीर्य हो हमें वीर्य प्रदान करो ! तुम वल हो—हमें वल प्रदान करो ! तुम शोड हो—हमें शोड प्रदान करो ! तुम आनन्द हो—हमें आनन्द प्रदान करो और तुम पराक्रम हो, अतः हमें पराक्रम प्रदान करो ।
तुम सब प्रकार की योग्यताओं के केन्द्र हो । तुममें संसार की समस्त शक्तियाँ भरी हुई हैं और तुम उनको अधीश्वर हो ! जिसके पास जो वस्तु होती है, वह उसी से माँगने पर प्राप्त होती है, अतएव हम तुमसे याचना करते हैं कि हमें तुम्हारे दिव्य गुण प्राप्त हो ! जिनसे हम अपने ब्रह्मचर्य का पालन कर जनता का हित करें । बिना तुम्हारी कृपा के यह महान्त फलित नहीं हो सकता । हमें पूर्ण आशा है कि स्वच्छ हृदय की प्रार्थना अवश्य स्वीकृत होगी ।