भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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वीर्य-रत्ना के सन्निधय

२- वीर्य-रत्ना के सन्निधय

‘वीर्यं रक्षति रक्षितम् !’

( सृष्टि )

जो अपने वीर्य की रक्षा करता है, वह (वीर्य) भी उसका संरक्षण करता है ।

‘वन्धाय विपयासक्तं, मुच्ये निर्लिप्य मनः !’

( सृष्टि )

विपय में आसक्त मन बन्धन और विद्युद्द मन मोक्ष का कारण होता है ।

ब्रह्मचर्य (वीर्य-संरक्षण) का विधिवत् पालन करना अत्यन्त कठिन काम है । साधारण से साधारण नियम का उल्लङ्घन करने से भी यह व्रत टूट जाता है । इसके पालन करने वालों में से बहुत ही थोड़े लोग सफल मनोरथ होते हैं । इसके निर्वह करने में कभी कभी महात्माओं से भी असावधानी हो जाती है । इसी लिये हमारे यहाँ शास्त्रों में बहुत से स्तब्ध और इन्द्रिय-निग्रह सम्बन्धी नियम लिखे गये हैं । यदि उनके काम में लाया जाय, तो ब्रह्मचर्य के पालन करने में अच्छी सहायता मिल सकती है ।

इस देश में दुर्भाग्य-वश ऐसी कुरीतियाँ फैल गई हैं कि उनके कारण सर्वत्र वीर्य का दुर्लभपोग हो रहा है । इस ईश्वरीय अनुपम शक्ति से लोग अपने को शून्य बना रहे हैं । कुछ लोगों को अम सा हो गया है कि वीर्य को रक्षित रखना असम्भव है ! पर ऐसी बात नहीं ! वीर्य का संरक्षण अवश्य किया जा सकता है, और यह प्रत्येक स्त्री-पुरुष का कर्तव्य धर्म है । परमात्मा ने