ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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सृष्टि करने और सुख-शान्ति से जीवन विताने के लिये ही मनुष्य का शरीर दिया है। ऐसे बड़े अधिकार को जो खोता है, व कदापि दीर्घजीवी होकर, इस संसार का आनन्द नहीं भोगता।
यह बात प्रायः देखी जाती है कि पशुओं में भी वीर्य-रक्षा व भाव होता है। पक्षियों को भी असमय में वीर्य-नाश करते हुं प्रायः नहीं देखा गया है। पशु-पक्षी सभी संयम से रह कर समाज पर ही केवल सन्तान-वृद्धि के लिये अपने इस स्वाभाविक बल का उपयोग करते हैं। पर मनुष्य-जाति इतने भी गिर हुई है। उसमें भी सम्भ्य और सुशिक्षितों की दशा बहुत ही दुर्लभ है। इनकी अपेक्षा ग्रामीण और वन-पर्वत के रहने वाले स्त्री-पुरुषों में भी वीर्य-रक्षा विरोध रूप से होती है। ये लोग भी काम-चेष्ट में पड़ कर अपने सबन्ध(वीर्य) का अधिकता से क्षय नहीं करते
ऊपर लिखी हुई बातों को ध्यान में रख कर अब हम कुछ ऐसे नुने हुए उच्च सद्गुणों का वर्णन करते हैं, जिनके पालन करते रहने से बहुत अंशों में वीर्य-रक्षा आप ही आप हो सकती है। हमें पूर्ण विश्वास है कि जो स्त्री-पुरुष नियम काये इनको अपनावेगे, वे अवश्य अपने श्रेय (ब्रह्मचर्य) को प्राप्त कर सकेंगे। ये नियम वैज्ञानिक संदर्भ से भरे हुए हैं। इन्हें स्थाय्य और संयम के सिद्धान्त हैं। यही कारण है कि हमारे आर्य ऋषियों ने जहाँ-तहाँ शाकों में इन पर चलने के लिये उपदेश किया है। जो लोग वीर्य-रक्षा से हताश हो गये हैं, या ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हों, वे कुछ संयम के लिये संतत्या की परीक्षा कर देखें। अन्त में हम उन्हें यह भी दृढ़ विश्वास दिलाते