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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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सृष्टि करने और सुख-शान्ति से जीवन विताने के लिये ही मनुष्य का शरीर दिया है। ऐसे बड़े अधिकार को जो खोता है, व कदापि दीर्घजीवी होकर, इस संसार का आनन्द नहीं भोगता।

यह बात प्रायः देखी जाती है कि पशुओं में भी वीर्य-रक्षा व भाव होता है। पक्षियों को भी असमय में वीर्य-नाश करते हुं प्रायः नहीं देखा गया है। पशु-पक्षी सभी संयम से रह कर समाज पर ही केवल सन्तान-वृद्धि के लिये अपने इस स्वाभाविक बल का उपयोग करते हैं। पर मनुष्य-जाति इतने भी गिर हुई है। उसमें भी सम्भ्य और सुशिक्षितों की दशा बहुत ही दुर्लभ है। इनकी अपेक्षा ग्रामीण और वन-पर्वत के रहने वाले स्त्री-पुरुषों में भी वीर्य-रक्षा विरोध रूप से होती है। ये लोग भी काम-चेष्ट में पड़ कर अपने सबन्ध(वीर्य) का अधिकता से क्षय नहीं करते

ऊपर लिखी हुई बातों को ध्यान में रख कर अब हम कुछ ऐसे नुने हुए उच्च सद्गुणों का वर्णन करते हैं, जिनके पालन करते रहने से बहुत अंशों में वीर्य-रक्षा आप ही आप हो सकती है। हमें पूर्ण विश्वास है कि जो स्त्री-पुरुष नियम काये इनको अपनावेगे, वे अवश्य अपने श्रेय (ब्रह्मचर्य) को प्राप्त कर सकेंगे। ये नियम वैज्ञानिक संदर्भ से भरे हुए हैं। इन्हें स्थाय्य और संयम के सिद्धान्त हैं। यही कारण है कि हमारे आर्य ऋषियों ने जहाँ-तहाँ शाकों में इन पर चलने के लिये उपदेश किया है। जो लोग वीर्य-रक्षा से हताश हो गये हैं, या ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हों, वे कुछ संयम के लिये संतत्या की परीक्षा कर देखें। अन्त में हम उन्हें यह भी दृढ़ विश्वास दिलाते

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वीर्य-रक्षा के सत्रियम

हैं कि इन सदुपायों के करने में यदि उनमें कुछ लाभ न हुआ, तो हानि तो किसी प्रकार की हो ही नहीं सकती। विरोध कहना न्यर्थ है !

(१) ब्राह्ममुहूर्त्त-जागरपा

ब्राह्मे मुहूर्त्तं वृष्येत्, धर्माभ्यां चासुचित्तयेत् । कायकृशोश्च तन्मूलान्वेदतत्पार्थ मेव च ॥

( मनुस्मृति )

ब्राह्म मुहूर्त्त में व्रत कर धर्म और अर्थ का चिन्तन करना चाहिये। अपने शरीर के क्लेशों और उनके कारणों पर विचार करना चाहिये और वैदों के तत्वों का अध्ययन करना चाहिये।

रात के चौथे पहर का नाम ब्राह्ममुहूर्त्त है। बहुत प्राचीन समय से इस समय व्रतने का विधान है। क्योंकि इस समय त्रिविध वायु चलती है, प्रकृति सौम्यता और सुन्दरता से भर जाती है, तथा सर्वत्र शान्ति और प्रसन्नता के दृश्य दिखलाई पड़ते हैं। सूर्योदय से पहले व्रत जाना स्वास्थ्य के लिये बड़ा ही उपयोगी है। इस समय में व्रतने की आज्ञा धर्म-शास्त्र और आयुर्वेद-शास्त्र, दोनों के मत में हितकर माना गया है। इसे देव-बेला भी कहते हैं। दिन रात में यह समय बहुत ही उत्तम होता है। सत्कार्यों के करने के लिये ही ईश्वर ने यह समय बनाया है। इस समय में व्रतने वाला मनुष्य स्वस्थ और सदाचारी बन जाता है। जो लोग इस समय सोते रहते हैं, वे प्रायः अल्पायु, आलसी, दरिद्री, दुरात्मा इती और विषयी होते हैं। इसलिये वीर्य-रक्षा के इन्तुकों को चाहिये कि सदा ब्राह्ममुहूर्त्त में व्रतने का उपयोग करें।

मनुष्य-विज्ञान

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अब हम ब्राह्मसूहर्त में उठने के कुछ लाभों को नीचे लिखते हैं: (१) ब्राह्मसूहर्त में जागने से दुःख तीव्र होती है। (२) मनुष्य रोग रहित और स्वस्थ बनता है। तथा लक्ष्मीबायू और यशस्वी होता है। (३) मन की सद्वृत्तियाँ जागृत होती हैं।

( २ ) उपःपान

सचितुः समुदयकाले, प्रसूती सलिलस्य पिवेदष्टो। रोगजरा परिमुक्तो, जीवेष्टस्वर शतं सायम् ॥

( आशुर्वेद

जो मनुष्य सूर्य के उगने से कुछ पहले आठ अञ्जली जल पीता है, वह रोग और दुःखता से रहित हो कर दो वर्षों से भी अधिक जीता है।

वैद्यक के प्रायः सभी आचार्यों ने उपःपान करने का समय सूर्योदय से पहले ( ब्राह्मसूहर्त ) माना है। इस समय का जल पीना बड़ा लाभदायक होता है। शरीर के सब रोग इससे दूर हो सकते हैं। हमें स्वयं भी इस बात का अनुभव है। अब तक हमने कई रोगियों को उपःपान की विधि से अच्छा किया है। ऊप के श्लोक में आठ अञ्जली जल पीने को लिखा गया है। पर देश, काल तथा बल के अनुसार कम भी कर दिया जा सकता है।

अब हम उपःपान के गुणों को नीचे लिखते हैं:—

  • ( १ ) उपःपान से वीर्यसम्बन्धी कई रोग दूर हो जाते हैं।
  • ( २ ) काम-विकार को शान्ति मिलती है।
  • ( ३ ) और शरीर में बल्यता नहीं बढ़ती।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम्

( ४ ) मेधा और शक्ति की वृद्धि होती है । ( ५ ) कोष्ण-वृद्धता, अजीर्ण तथा स्तम्भ-दोष आदि राग नहीं होते ।

( ३ ) मल-मूत्र-विमर्जन

मूत्रोच्च्चारसमुत्सर्गः, दिवाकुर्यादुदड्मुखः । दक्षिणामिमुखो रात्रौ, सन्ध्ययोश्च यथादिव॥

( मवृत्स्थिति )

दिन में उत्तर मुख करके तथा रात में दक्षिण मुख करके मल-मूत्र-त्याग करना चाहिये !

वैद्यक-शास्त्र के मत से भी सूर्योदय से पहले मल-मूत्र का त्याग करना उपयोगी है । जहाँ तक हो खुले मैदान वाएकान्त स्थान में बस्ती में कुछ दूर मल-त्याग करना चाहिये; साथ ही दूसरे के किये हुए पर भी न करना चाहिए ।

प्राचीन समय में लोग प्रायः बस्ती से दूर जंगलों में टह्री जाया करते थे । इससे उन्हें छुट्टा वायु-खेवन का भी लाभ हो जाता था । साथ ही बस्ती में गंदगी भी नहीं फैलने पाती थी । पर खेद है कि इस नये फेरान के फेर में पड़ कर लोग प्राचीन और उपयोगी प्रणाली को भूलते जाते हैं !

मल-मूत्र की हाजत होने पर उसे न रोकना चाहिए । क्योंकि ऐसा करने से अनेक व्याधियाँ उत्पन्न हो जाती हैं ।

आलस्य-वश जो लोग इस आवश्यकता को रोकते हैं, वे अपने स्वास्थ्य को खो बैठते हैं । उनके मलाशय और मूत्राशय में विकार

महाचर्य-विज्ञान

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सपन्न हो जाते हैं इस से वीर्य तथा अन्य धातुओं की ह्रां होती है ।

‘सर्वेषामेव रोगाणां, निदानं कुरपिता मलाः ।’

( वैद्यक

मल के बिगड़ने से ही प्रायः अनेक रोगों की उत्पत्ति होती है । ठीक समय से साफ़ पालवाना हो जाने से दिन भर स्फूर्ति, उद्योग शीलता, प्रसन्नता, सुखुद्धि और सदगुणों कं बृद्धि होती है । प्रसाद, अग्नि मन्दता, पीड़ा तथा न्वर आदि रोग नहीं सवाते ।

प्रातःकाल मल-मूत्र त्यागाने वाले का वीर्य शुद्ध और विका से रहित रहता है ।

( ४ ) उपस्थेन्द्रिय की स्वच्छता

‘उपस्थेन्द्रियमेवास्ति, पाप-रोग-प्रदायकम् ।’

( सृष्टि )

गुप्तेन्द्रियों की स्वच्छता से मन को शान्ति प्राप्त होती है, काम-विकारों की सम्भावना नहीं रहती तथा दाह, खुजली, दुर्गन्धि, क्रिभि और खण्डोष आदि से रक्षा होती है । नेत्रों में व्योति, मस्तिष्क में विचार की स्फूर्ति भी बढ़ती है ।

वास्तव में मनुष्य के लिये गुप्त इन्द्रियों को स्वच्छ रखना भी बड़ा हित कर है । इनकी अपवित्रता से भी विचार उत्पन्न हो जाता है । कई प्रकार के इन्द्रिय सम्बन्धी गुप्त रोग भी उत्पन्न

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वीर्य-रत्ना के सलियम

होते हैं। अस्वच्छता के कारण इन्द्रियों में उत्तेजना होने से वीर्य-पात का कारण भी हो सकता है। इसलिये शीघ्र के समय प्रायः दोनों चार गुप्त इन्द्रियों को शुद्ध और ठण्डे जल से धो डालना चाहिये। इस समय के अतिरिक्त जननेन्द्रिय का दूना बहुत ही हानिकारक माना गया है।

वहूत से लोग तो मूत्र-स्थाने के पश्चात् भी अपने गुप्त इन्द्रिय को जल से धो देते हैं। यह प्रणाली भी वहूत अच्छी है। इस में भी वीर्य-रत्ना का तत्व भरा हुआ है।

( ५ ) वायु-सेवन

सुख प्रवातं सेवेत, श्रीषो शरदि चान्तरा । निर्वातमायुषे सेव्यमारोग्यायच सवदा ॥

( वायुवैद )

श्रीष्म और शरद् ऋतु में सुख-पूर्वक वायु-सेवन करना चाहिये। और अन्य ऋतुओं में भी आयु और आरोग्य के लिये कम हवा के स्थान पर घूमना चाहिये।

वैद्यक-शास्त्र में भिन्न-भिन्न दिशा की वायु का भिन्न-भिन्न गुण लिखा गया है। आधिक वायु में घूमना कभी कभी हानिकारक होता है, इसलिये वर्जित है। प्रातःकाल त्रिभिष वायु चलती है, जो स्वास्थ्य के लिये वहूत ही अच्छी मानी गई है।

वहूत से लोग सन्ध्या समय छवियों में टहलने जाते हैं। पर प्रातःकाल का टहलना विशेष उपयोगी होता है। वायु-सेवन न करने वालों का स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं रह सकता। कई दोनों

प्रधान्यर्थ-विज्ञान

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में डॉक्टर लोग अपने रोगियों को वायु-सेवन के लिये दूर-दूर भेजते हैं।

अब हम वायु-सेवन से होने वाले कतिपय लाभों का नी वर्णन करते हैं :—

( १ ) प्रातःकाल वायु-सेवन करने से देह की धातु अं वषधायुर् शुद्ध और पुष्ट होती है।

( २ ) मनोद्वेग, आलस्य, धिन्त्ता, दुर्बलता, भय और रो आदि का नाश होता है।

( ३ ) मनुष्य बुद्धिमान और बलवान होता है।

( ४ ) नेत्र और श्रवण की शक्ति बढ़ती और स्थि रहती है।

( ५ ) काम-त्रिकार और अपस्थेन्द्रिय को शान्ति मिलती है

( ६ ) नित्य स्नान

गुणः सदास्नानपरस्य साधोः

रूपश्च तेजश्च बलश्च शौचम् ॥

आयुष्यमारोग्यचलावृत्तम् ।

दुःखमनाशश्च यशश्च मेघाम् ॥

( बागी वाक्वरक्य

हे सज्जनों ! सदैव स्नान करने वाले मनुष्य की रूप, तेज बल, पवित्रता, आयुष्य, आरोग्य, अलोछुपता, वृद्धि स्त्रों का आना, यश और मेघा आदि गुण प्राप्त होते हैं।

‘स्नानं यशश्चआयुष्यं, श्रमस्वेद-मलापहरम् ।’

( चरक-संहिता

स्नान करने से यमुख और आयुष्य की वृद्धि होती है। परिश्रम

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वीर्य-रत्ना के संक्षिप्त

करने से पसीना आता है और इसलिये शरीर का मल दूर होता है।

हिन्दू-धर्म में स्नान का बड़ा साहाय्य है। यह विज्ञान से बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है। अन्तः शुद्धि के साथ साथ बाह्य शुद्धि की भी मनुष्य के लिये आवश्यकता होती है। जो लोग स्नान नहीं करते, वे प्रायः आलसी होते हैं और चर्म-रोगों में फँसे रहते हैं।

प्रायः-काल का स्नान बहुत ही उपयोगी होता है। सायङ्काल को भी स्नान किया जा सकता है। ग्रीष्म-ऋतु में दो बार स्नान करना आवश्यक है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष को सदैव कम से कम एक बार तो अवश्य ही स्नान कर लेना चाहिये। स्नान के समय सारे शरीर को भलीभाँति मल-मल कर धोना चाहिये। स्नान के लिये स्वरुद्ध और ताजा जल बहुत ही उपयोगी माना गया है। शरद ऋतु में अधिक शीत पड़ने पर गरम जल से भी स्नान करना हानिकारक नहीं है। पर शिर को पहले पहल ठण्डे जल से ही धो लेना चाहिये। कृष जल सभी ऋतुओं में नहाने में लाभ-दायक होता है। थोड़े जल से नहाने में शरीर के छोटे छोटे छिद्रों का मल दूर नहीं होता, और भीतर का दोष बाहर नहीं निकलने पाता। इसलिये यदि नदी पास हो तो उसी के जल में नियमित रूप से स्नान करना चाहिये। मित्य स्नान से वीर्य तथा शरीर के अन्य धातुओं को शान्ति मिलती है।

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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(७) कौपीन-धारण

‘कौपीनवस्त्रः खलु भाग्यवन्तः ।’

(शंकराचार्य)

कौपीन के (लङ्कोट के) धारण करने वाले वास्तव में भाग्यवान् पुरुष ही होते हैं।

इस देश में कौपीनधारी प्रायः ब्रह्मचारी और संन्यासी ही हैं। ये इसलिये कौपीन पहनते हैं कि वपस्थेन्द्रियों में काम-विकार से उत्तेजना न उत्पन्न होने पावे। इन्हें वीर्य-रक्षा की विशेष रू से आवश्यकता रहती है। ब्रह्मचारी और संन्यासियों के लिए कौपीन धारण करने का शास्त्रीय नियम भी प्राचीन समय चला आता है। इसके अतिरिक्त मरुल-युद्ध (कुरती) करने वा भी कौपीन (लङ्कोट) पहनते हैं। क्योंकि इन्हें भी वीर्य-रक्षा लिये संयम रखना पड़ता है। विषय-लोलुषों को कौपीन धार करना बहुत दुष्ट जान पड़ता है।

कौपीन का वस्त्र बहुत मोटा न होना चाहिये। दोहरा हो से इन्द्रिय पर विशेष गर्मी पहुँचने से भी वीर्य-पात हो सका है। एक पतला और खच्छ ब्रह्म कौपीन (लङ्कोट) के लिये बर उपयोगी है।

कुछ लोगों की धारण सी हो गई है कि धोती के नीचे कौपीन (लङ्कोट) धारण करने से महानुष्य नपुंसक हो जाता है। य बात मिथ्या है। इससे तो बल्कि अधिक समय तक के लिए पुंसत्व रक्षित रहता है। कौपीन धारण करने से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

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वीर्य-रक्षा के सक्षिप्त

(१) कौपीन पहनने से भयङ्करोप नहीं बढ़ता । (२) इन्द्रियों में प्रचुर शक्ति स्थित होती है (३) मन पर अपना अधिकार हो जाता है । (४) वल, उत्साह, स्फूर्ति, सदाचार, सत्यम और सत्सङ्ग आदि की वृद्धि होती है ।

(८) प्राणायाम-साधन

दहान्ते ध्मायमानानां, धातुनां हि यथा ।मलाः । तयेन्द्रियाणां दहान्ते, दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥

( मनुस्मृति )

जैसे अग्नि में डालकर तपाने से धातुओं के मल जल जाते हैं, वैसे ही प्राणायाम के करने से इन्द्रियों के सब दोष भस्म हो जाते हैं ।

प्राणायाम की विचित्र शक्ति का बोध प्राणायाम करनेवाले लोगों को ही पूर्ण रूप से होता है, पर साधारण जनता भी इसके अमूल्य लाभों से अपरिचित नहीं है । यह प्राणायाम ब्रह्मचारी और योगियों के लिये विशेष रूप से प्रविश्वित है । गृहस्थाश्रम में रहने वालों के लिये भी प्राणायाम की आज्ञा है ॥ इसको उत्पन्न रीति से करते रहने से अनेक कष्ट-साध्य रोग दूर हो जाते हैं ।

प्राणायाम सन्ध्योपासन का भी सब से प्रधान अङ्ग है । वीर्य-


ॐ प्राणायाम के सारगन्ध में विशेष चार्ले ज्ञान के लिये लेखक का 'प्राणायाम-व्यायाम' नामक ग्रन्थ पढ़िये !

असम्बन्ध-विज्ञान

३।

रक्षण के लिये प्राणायाम एक आवश्यक परमोत्तम साधन है। वीर्य जल की भाँति तरल होने के कारण उसका स्वाभावी प्रवाह नीचे को ओर होता है। जैसे एक एक विन्दु जल निकलते रहने से घड़ा खाली हो जाता है, उसी भाँति वीर्य बाहर प्रवाहित होते रहने से शरीर भी शुन्य और निर्जीव जाता है। अन्तमें शारीरिक और मानसिक योग्यताओं का हास्य से मनुष्य शीघ्र ही काल के कराल गाल में चला जाता है। एवं मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह अपने वीर्य को ऊर्ध्वगाम बनाकर अपने मस्तिष्क और सर्वाङ्ग को पुष्ट करने का स अभ्यास करता रहे। इसके लिये प्राणायाम से बद्ध कर असाधन नहीं है।

भिन्न भिन्न आचार्यों के मत से प्राणायाम के अनेक भेद हैं। पर खास भेद तीन ही हैं, और दूसरे भेद सभी इन्हीं अन्तर्गत हैं।

प्राणायामाभिधा श्लोका, पूरकुम्भकरेचकैः।

सहितः कुम्भकश्चेति, कुम्भको द्विविधो मतः ॥

प्राणायाम के तीन प्रकार होते हैं। पहला पूरक, कुम्भ और रेचक के साथ, दूसरा कुम्भक के साथ और तीसरा कुम्भ हीन होता है। कुम्भक भी दो प्रकार का होता है। पहला पूरक और रेचक सहित तथा दूसरा केवल कुम्भक।

(१) पूरक—नाक के दाहिने छेद को दाहिने हाथ के अंग से दबा कर बायें से धीरे धीरे वायु पेट में भरना।

(२) कुम्भक—फिर बीच की दोनों अंगुलियों से नाक बायें छेद को भी बन्द कर पेट में भरी हुई वायु को रोकना।

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वीर्य-रक्षा के सशियम

( ३ ) रेचक—और फिर नाक के वायें छेद से धीरे धीरे वायु को बाहर निकाल देना चाहिये ।

ऊपर की क्रिया के कर लेने पर एक प्राणायाम होता है । इसी प्रकार नौ बार पूरक, कुम्भक और रेचक के करते रहने पर सीन प्राणायाम होते हैं । प्रत्येक मनुष्य को एक समय में कम से कम ३ प्राणायाम करना आवश्यक है ।

“प्राणायामान् पडाचरेभ् ।”

भगवान् मनु का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति को ६ प्राणायाम करना चाहिये । इसका अभिप्राय यह है कि ३ प्राणायाम प्रातःकाल और ३ ही सायंकाल करना आवश्यक है ।

प्राणायाम करते समय नीचे लिखा हुआ मन्त्र प्रतिवार पढ़ते रहना चाहिये ।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ ज्ञः ॐ तपः ॐ सत्यं, ॐ तत्सबितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचो- दयात् ।

एक मत यह भी है कि विना मन्त्र के भी प्राणायाम किया जा सकता है । पर ऐसी अवस्था में यह नियम है कि जितने समय में पूरक हो, उसके दूने समय में कुम्भक और त्रिगुने समय में रेचक करना चाहिये ।

दुर्गनिधत और संकुचित स्थान पर बैठ कर प्राणायाम करने से बड़ी हानि होने की सम्भावना है । इसलिये प्राणायाम के लिये स्वच्छ समतल और सुरम्य भूमि का होना बहुत आवश्यक है । शुद्ध वायु में सिद्धान्त से (विधि आगे लिखी गई है) बैठकर प्राणा-

महाचर्य-विद्वान

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याम करने से अनेक लाभ होते हैं । जिनका हम नीचे वर्ण करते हैं—

( १ ) प्राणायाम के अभ्यासी के हृदय में काम-विकार नष्ट होता ।

( २ ) मन और इन्द्रियों पर अधिकार प्राप्त होता है ।

( ३ ) बुद्धि तथा वल की बुद्धि होती है ।

( ४ ) बुद्धता, योग तथा चीणता का भय नहीं रहता ।

( ५ ) वीर्य की अयोगति नहीं होती ।

( ६ ) शारीरिक और मानसिक विकास होता रहता है ।

( ७ ) मनुष्य की दैवीगुण प्राप्त होते हैं ।

( ८ ) अधर्म की ओर विचलन नहीं जाता ।

( ९ ) दीर्घायु और सुसन्तान प्राप्त होती है ।

( १० ) कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं ।

(६) मानसिक योग

“समस्वं योग उच्यते ।”

चित्त की समता का नाम योग है ।

ज्ञाननिष्ठो विरक्तो वा, धर्मशोडषि जितेन्द्रियः ।

विना योगेन देवोऽपि, न मोक्षं लभते भिये ॥

( योग-गीता )

( भगवान् शङ्कर पार्वतीजी से कहते हैं ) हे पार्वती ! वड़ा ज्ञानवान्, वैरागी, धर्मिष्ठ और जितेन्द्रिय कोई मनुष्य क्यों न हो, पर विना योग के मुक्ति का अधिकारी नहीं बन सकता ।

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वीर्य-रक्षा के सखियम

योग का महत्व बतवाने की आवश्यकता नहीं । साधारण से साधारण प्रकार की योग-क्रिया मनुष्य को असाधारण लाभ पहुँचाने में समर्थ है । इसलिये वीर्य-संरक्षण के लिये योग बहुत उत्तम साधन माना गया है । हमारे ऋषि लोग भी योग के द्वारा ही अपने ब्रह्मचर्य-व्रत का पूरा पालन करते थे ।

हमारे प्रचीन आचार्यों ने योग के भी अनेक भेद निर्धारित किये हैं । पर उन सबों के वर्णन की यहाँ पर आवश्यकता नहीं । हम यहाँ पर मूल योग को ही लिखना चाहते हैं । उसका भागवत श्री कृष्ण ने निम्नलिखित आदेश किया है ।

पवित्र स्थान पर, जो कि न तो बहुत ऊँचा हो और न नीचा हो, कुशासन, मृगचर्म या वस्त्र विच्छा कर बैठना चाहिये । उस समय अपने मन को एकाग्र कर चित्त और हृदिष्वों के कामों को वश में करके अपनी आत्म-शुद्धि के लिये योग का अभ्यास करे !

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नवसं स्थिरम् ।

सम्भेद्य नासिकायं स्वं, दिशश्चानवलोकयन् ॥

प्रश्नान्तात्मा विगतमीर्द्राचारित्रमेत्यिव ।

मनः संयम्य भविष्यति, युक्त श्वासीत मतपरः ॥

( श्रीमद्भगवद्गीता )

शरीर, ( मध्यभाग ) शिर और गर्दन को सीधे रखे । कौड़े अङ्ग इधर उधर झूलने न पावे । अर्थात् सब शरीर को स्थिर रखना चाहिये । किसी भी दिशा को न देखना हुआ अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर ठहराना चाहिये । शान्त चित्त, भयरहित और ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित हो, मन को संयम कर आत्मनिष्ठ पुरुष मुक्त ( परमात्मा ) में लीन होवे ।

महाचर्य-विज्ञान

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ऊपर लिखी हुई मानसिक योग की क्रिया आँखें मूँद कर भंग की जा सकती है। पर बस अवस्था में भी मानसिक दृष्टि नासिका के अपभ्रंश के लिए ही रहना चाहिये।

जैसे शरीर के लिये भोजन की आवश्यकता होती है, उस प्रकार जीवात्मा के लिये मानसिक योग की आवश्यकता अनिवार्य है।

अब हम इस मानसिक योग से होने वाले कुछ लाभों के वर्णन यहाँ पर करते हैं:—

(१) योग के साधन से मनुष्य का वीर्य नष्ट नहीं होने पाता।

(२) मस्तिष्क और मन में ब्रह्मचर्य की रक्षण-शक्ति प्राप्त होती है।

(३) चित्त की चञ्चलता नष्ट हो जाती है।

(४) उत्तमोत्तम विचार और कार्य की इच्छा होती है।

(५) परमानन्द और शान्ति की उपलब्धि होती है।

(६) सदाचार में सहायता मिलती है।

(७) अधर्म और अनाचार में चित्त नहीं दमता।

(८) सदैव उत्साह, साहस, धैर्य, प्रेम और औदार्य की प्रवृद्धि होती है।

(९) दीर्घ-जीवन और आरोग्य प्राप्त होता है।

(१०) अन्त में मोक्ष भी प्राप्त होता है।

योग के सम्बन्ध में लिये अधिक जानने की इच्छा हो, वा अन्यकर्ता का 'योगाचार-दर्शन' देखे।

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धीर्य-त्वा के सजियम

(१०) सन्ध्यावन्दन

“श्रुतयो दीर्घं सन्ध्यात्वादीर्घमायुखान्युयुः । प्रहो यशश्च कीर्तिञ्च श्रुतचर्चसमेव च ॥”

( ममरुति )

चट्पि लोग देर तक सन्ध्यावन्दन करने के कारण दीर्घायु, खुदछि, सुकीर्ति और ब्रह्मलेज को प्राप्त होते थे ।

सन्ध्यावन्दन की प्रणाली इस देश में बहुत प्राचीन है । हमारी हिन्दू-जनता इसके नाम से भली भाँति परिचित है । यह मनुष्य-जाति के लिये एक बड़ा आवश्यक कर्तव्य है ।

सन्ध्याका अर्थ है एकाग्र चित्त से ध्यान करना, परमेश्वर की वप्रासना करना, अपने दिन भर के किये कामों पर विचार कर उरे कामों के लिये पश्चात्ताप करना, आगे के लिये दुरे काम न करने की प्रतिज्ञा करना, आगे का समय सदुप्यबहारों में व्यतीत हो इसकी परमात्मा से प्रार्थना करना आदि ।

हमारी सन्ध्या में बहुत गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है । इसीलिये आवश्यक से आवश्यक कार्य की लोग छोड़ कर इसे करते थे । महाभारत में भी पितामह भीष्म, श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर आदि सन्ध्या- पासन करते थे, और सन्ध्या होते ही युद्ध बन्द हो जाता था । इतने से ही सन्ध्या का महत्व जाना जा सकता है । . . . .

संध्या प्रातःकाल और सार्यकाल दो बार अवश्य करना चाहिए । संध्या करते समय गायत्री-मन्त्र का भी जप करने का विधान है । वह हम नीचे उद्धृत करते हैं:—

ग्रहार्च्य-विज्ञान

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ॐ भू भुजः स्वस्तसवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो नः प्रचोदयात् ।

हे सर्वव्यापक, अखिल-गुणसम्पन्न तथा ज्योतिर्मय परमात्म हमारी (सर्वश्रेष्ठ वस्तु) बुद्धि को शुद्ध एवं सद्चिन्तावाली बनाओ इस मंत्र को एक हजार बार, सौ बार या दस बार अवश्य जप लेना चाहिये ।

अब संध्यापासना के लाभों को नीचे लिखते हैं:—

  • ( १ ) इससे मन पवित्र और संयमी बन जाता है ।
  • ( २ ) भगवद्भक्ति में चिन्ता रमता है ।
  • ( ३ ) गुरुतर से गुरुतर भी पाप छूट जाते हैं ।
  • ( ४ ) विषय वासनायें तुच्छ ज्ञात होने लगती हैं ।
  • ( ५ ) शरीर बलवान्, तेजस्वी और दीर्घजीवी बनता है ।

(११) स्वल्पहार

“शनायोयमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् ।

अपुण्यं लोकविद्धिं, तस्मात्परिवर्जयेत् ।

(चा० नी०)

अति भोजन से अस्वस्थता बढ़ती है—आयुर्वेत् कीय होता है—अनेक रोग पैदा होते हैं—पाप कम होते हैं और लोगों में निंदा होती है । इसलिये अधिक भोजन करना बर्जित है ।

“स्वल्पहारः सुखावहः ।”

(सूक्ति)

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वीर्य-रत्ना के ससियमः

थोड़ा आहार करना सुख-द्वायक होता है ।

जीवधारियों के लिये आहार बहुत आवश्यक पदार्थ होता है । पर विशेष होने से यही हासि पहुँचाता है । स्वरूपाहार करने वाले सदा सुखी रहते हैं । विशेष आहार करने वालों को प्रायः स्वप्नदोष से पीड़ित पाया गया है । कुछ लोगों की कुवारापा स्त्री हो गई है कि जितना ही खाया जाय उतना ही अरुद्धा है । बड़े वैशों का कहना है कि थोड़ा ही आहार करना स्वास्थ्य के लिये उपयोगी होता है । प्रत्येक ग्राम ( कबल ) को दांतों से खून मसल कर खाना चाहिये । आहार वसना ही करना चाहिये जितना कि सुगमता से पच सके । विशेष आहार से भजीयों, ज्वर, संमहणी, कोप्रबद्धता और घातु-दोर्बल्य आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । भोजन कर लेने पर पानी और हवा के लिये पेट में काफी स्थान छोड़ देना चाहिये ।

अब हम स्वरूपाहार के गुणों को नीचे लिखते हैं:—

( १ ) शरीर स्वस्थ और नीरोग रहता है ।

( २ ) मन में बल और स्फूर्ति का वास रहता है ।

( ३ ) आलस्य, मिद्रा, अतुल्लाह नाश होता है ।

( ४ ) इससे वीर्यरत्ना में भी बहुत सहायता मिलती है ।

प्रश्नचर्य-विज्ञान

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(१२) सात्विक भोजन

आयुः सत्त्वश्लोकोर्यं, सुखभीतिविवर्द्धनाः ।

रस्याः स्निग्धास्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥

( भगवद्गीता )

जो आहार आयुष्य, ओज, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति के बढ़ाने वाला हो और जो सरस, चिकना, शुद्ध तथा रुचि-बर्द्धक हो वह सात्विक लोगों को प्रिय होता है ।

प्रश्नचर्य पालन करने वालों को आहार पर बहुत ध्यान देना चाहिये । तामस आहार से कभी वीर्य-रक्षा नहीं हो सकती । सात्विक आहार करते रहने से मानसिक वृद्धि भी सात्विक ब जाती है ।

( १ ) सात्विक आहार से शरीर की सब धातुओं को लाभ पहुँचता है । ( २ ) बुद्धि और शक्ति बढ़ती है । ( ३ ) काम क्रोध, मद, लोभ और मोह का नाश होता है । ( ४ ) स्वारस्य और जीवनी-शक्ति की वृद्धि होती है ।

१३—फलआहार

वैद्यक शास्त्रों में फलआहार के अपरिमित लाभों का वर्णन है इस बात को प्रायः सभी लोग जानते होंगे कि हमारे ऋषि-मुनि फलआहारी होते थे । बहुत से लोग ऐसी भी हुए हैं कि जिन्होंने फल या मूलों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं खाया है । दूसरा ऋषि दूध ही खाकर बहुत दिनों तक जीवित रहे ।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम्

फलों में प्राकृतिकता विशेष है। बहुत से वैद्य लोग बड़े बड़े रोगियों को फल खाने की सलाह देते हैं। एकादशी जैसे कई उपवास प्रभों में भी लोग फल खाकर रह जाते हैं। भोजन कर लेने के पश्चात् फल खाना बहुत आवश्यक है। जो लोग काम-विकारों से विशेष पीड़ित हों, वे कुछ दिनों तक फल खाकर ही रहें। जो फल जिस च्छु में होता है, वह उस च्छु में अधिक लाभ-कारी होता है। वीर्य-रत्ना के लिये फलों का खाना भी बहुत लाभ-दायक है।

अब हम फलाहार से होने वाले कतिपय लाभों को नीचे लिखते हैं:—

( १ ) फलाहार से स्वास्थ्य, दीर्घायु, बल और बुद्धि की बढ़ती होती है।

( २ ) कोष्ठशुद्धता, निर्बलता, मल-विकार, ज्वर तथा अन्य रोगों से रक्षा होती है।

( ३ ) मन शान्त होकर सत्कर्मों में लगता है।

( ४ ) वीर्य पुष्ट होता है, काम-शक्ति की प्रेरणा दब जाती है, और इन्द्रियों पर विजय मिलती है।

(१४) दुग्ध-पान

इस संसार में यदि कोई पदार्थ अमृत कहलाने योग्य है तो वह दुग्ध ही है। प्रायः सभी वैद्यक शास्त्रों के रचयिताओं ने इस की प्रशंसा की है। पाश्चात्य देश के कई डाक्टर लोग केवल दुग्ध से ही कई रोगों को दूर करते हैं।