ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 319, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंअसम्बन्ध-विज्ञान
३।
रक्षण के लिये प्राणायाम एक आवश्यक परमोत्तम साधन है। वीर्य जल की भाँति तरल होने के कारण उसका स्वाभावी प्रवाह नीचे को ओर होता है। जैसे एक एक विन्दु जल निकलते रहने से घड़ा खाली हो जाता है, उसी भाँति वीर्य बाहर प्रवाहित होते रहने से शरीर भी शुन्य और निर्जीव जाता है। अन्तमें शारीरिक और मानसिक योग्यताओं का हास्य से मनुष्य शीघ्र ही काल के कराल गाल में चला जाता है। एवं मनुष्य का परम कर्तव्य है कि वह अपने वीर्य को ऊर्ध्वगाम बनाकर अपने मस्तिष्क और सर्वाङ्ग को पुष्ट करने का स अभ्यास करता रहे। इसके लिये प्राणायाम से बद्ध कर असाधन नहीं है।
भिन्न भिन्न आचार्यों के मत से प्राणायाम के अनेक भेद हैं। पर खास भेद तीन ही हैं, और दूसरे भेद सभी इन्हीं अन्तर्गत हैं।
प्राणायामाभिधा श्लोका, पूरकुम्भकरेचकैः।
सहितः कुम्भकश्चेति, कुम्भको द्विविधो मतः ॥
प्राणायाम के तीन प्रकार होते हैं। पहला पूरक, कुम्भ और रेचक के साथ, दूसरा कुम्भक के साथ और तीसरा कुम्भ हीन होता है। कुम्भक भी दो प्रकार का होता है। पहला पूरक और रेचक सहित तथा दूसरा केवल कुम्भक।
(१) पूरक—नाक के दाहिने छेद को दाहिने हाथ के अंग से दबा कर बायें से धीरे धीरे वायु पेट में भरना।
(२) कुम्भक—फिर बीच की दोनों अंगुलियों से नाक बायें छेद को भी बन्द कर पेट में भरी हुई वायु को रोकना।