भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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वीर्य-रक्षा के सशियम

( ३ ) रेचक—और फिर नाक के वायें छेद से धीरे धीरे वायु को बाहर निकाल देना चाहिये ।

ऊपर की क्रिया के कर लेने पर एक प्राणायाम होता है । इसी प्रकार नौ बार पूरक, कुम्भक और रेचक के करते रहने पर सीन प्राणायाम होते हैं । प्रत्येक मनुष्य को एक समय में कम से कम ३ प्राणायाम करना आवश्यक है ।

“प्राणायामान् पडाचरेभ् ।”

भगवान् मनु का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति को ६ प्राणायाम करना चाहिये । इसका अभिप्राय यह है कि ३ प्राणायाम प्रातःकाल और ३ ही सायंकाल करना आवश्यक है ।

प्राणायाम करते समय नीचे लिखा हुआ मन्त्र प्रतिवार पढ़ते रहना चाहिये ।

ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ ज्ञः ॐ तपः ॐ सत्यं, ॐ तत्सबितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचो- दयात् ।

एक मत यह भी है कि विना मन्त्र के भी प्राणायाम किया जा सकता है । पर ऐसी अवस्था में यह नियम है कि जितने समय में पूरक हो, उसके दूने समय में कुम्भक और त्रिगुने समय में रेचक करना चाहिये ।

दुर्गनिधत और संकुचित स्थान पर बैठ कर प्राणायाम करने से बड़ी हानि होने की सम्भावना है । इसलिये प्राणायाम के लिये स्वच्छ समतल और सुरम्य भूमि का होना बहुत आवश्यक है । शुद्ध वायु में सिद्धान्त से (विधि आगे लिखी गई है) बैठकर प्राणा-