भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 380 में से

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वीर्य-रक्षा के सखियम

योग का महत्व बतवाने की आवश्यकता नहीं । साधारण से साधारण प्रकार की योग-क्रिया मनुष्य को असाधारण लाभ पहुँचाने में समर्थ है । इसलिये वीर्य-संरक्षण के लिये योग बहुत उत्तम साधन माना गया है । हमारे ऋषि लोग भी योग के द्वारा ही अपने ब्रह्मचर्य-व्रत का पूरा पालन करते थे ।

हमारे प्रचीन आचार्यों ने योग के भी अनेक भेद निर्धारित किये हैं । पर उन सबों के वर्णन की यहाँ पर आवश्यकता नहीं । हम यहाँ पर मूल योग को ही लिखना चाहते हैं । उसका भागवत श्री कृष्ण ने निम्नलिखित आदेश किया है ।

पवित्र स्थान पर, जो कि न तो बहुत ऊँचा हो और न नीचा हो, कुशासन, मृगचर्म या वस्त्र विच्छा कर बैठना चाहिये । उस समय अपने मन को एकाग्र कर चित्त और हृदिष्वों के कामों को वश में करके अपनी आत्म-शुद्धि के लिये योग का अभ्यास करे !

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नवसं स्थिरम् ।

सम्भेद्य नासिकायं स्वं, दिशश्चानवलोकयन् ॥

प्रश्नान्तात्मा विगतमीर्द्राचारित्रमेत्यिव ।

मनः संयम्य भविष्यति, युक्त श्वासीत मतपरः ॥

( श्रीमद्भगवद्गीता )

शरीर, ( मध्यभाग ) शिर और गर्दन को सीधे रखे । कौड़े अङ्ग इधर उधर झूलने न पावे । अर्थात् सब शरीर को स्थिर रखना चाहिये । किसी भी दिशा को न देखना हुआ अपनी दृष्टि को नासिका के अग्रभाग पर ठहराना चाहिये । शान्त चित्त, भयरहित और ब्रह्मचर्य-व्रत में स्थित हो, मन को संयम कर आत्मनिष्ठ पुरुष मुक्त ( परमात्मा ) में लीन होवे ।

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