भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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महाचर्य-विज्ञान

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ऊपर लिखी हुई मानसिक योग की क्रिया आँखें मूँद कर भंग की जा सकती है। पर बस अवस्था में भी मानसिक दृष्टि नासिका के अपभ्रंश के लिए ही रहना चाहिये।

जैसे शरीर के लिये भोजन की आवश्यकता होती है, उस प्रकार जीवात्मा के लिये मानसिक योग की आवश्यकता अनिवार्य है।

अब हम इस मानसिक योग से होने वाले कुछ लाभों के वर्णन यहाँ पर करते हैं:—

(१) योग के साधन से मनुष्य का वीर्य नष्ट नहीं होने पाता।

(२) मस्तिष्क और मन में ब्रह्मचर्य की रक्षण-शक्ति प्राप्त होती है।

(३) चित्त की चञ्चलता नष्ट हो जाती है।

(४) उत्तमोत्तम विचार और कार्य की इच्छा होती है।

(५) परमानन्द और शान्ति की उपलब्धि होती है।

(६) सदाचार में सहायता मिलती है।

(७) अधर्म और अनाचार में चित्त नहीं दमता।

(८) सदैव उत्साह, साहस, धैर्य, प्रेम और औदार्य की प्रवृद्धि होती है।

(९) दीर्घ-जीवन और आरोग्य प्राप्त होता है।

(१०) अन्त में मोक्ष भी प्राप्त होता है।

योग के सम्बन्ध में लिये अधिक जानने की इच्छा हो, वा अन्यकर्ता का 'योगाचार-दर्शन' देखे।