ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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धीर्य-त्वा के सजियम
(१०) सन्ध्यावन्दन
“श्रुतयो दीर्घं सन्ध्यात्वादीर्घमायुखान्युयुः । प्रहो यशश्च कीर्तिञ्च श्रुतचर्चसमेव च ॥”
( ममरुति )
चट्पि लोग देर तक सन्ध्यावन्दन करने के कारण दीर्घायु, खुदछि, सुकीर्ति और ब्रह्मलेज को प्राप्त होते थे ।
सन्ध्यावन्दन की प्रणाली इस देश में बहुत प्राचीन है । हमारी हिन्दू-जनता इसके नाम से भली भाँति परिचित है । यह मनुष्य-जाति के लिये एक बड़ा आवश्यक कर्तव्य है ।
सन्ध्याका अर्थ है एकाग्र चित्त से ध्यान करना, परमेश्वर की वप्रासना करना, अपने दिन भर के किये कामों पर विचार कर उरे कामों के लिये पश्चात्ताप करना, आगे के लिये दुरे काम न करने की प्रतिज्ञा करना, आगे का समय सदुप्यबहारों में व्यतीत हो इसकी परमात्मा से प्रार्थना करना आदि ।
हमारी सन्ध्या में बहुत गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है । इसीलिये आवश्यक से आवश्यक कार्य की लोग छोड़ कर इसे करते थे । महाभारत में भी पितामह भीष्म, श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर आदि सन्ध्या- पासन करते थे, और सन्ध्या होते ही युद्ध बन्द हो जाता था । इतने से ही सन्ध्या का महत्व जाना जा सकता है । . . . .
संध्या प्रातःकाल और सार्यकाल दो बार अवश्य करना चाहिए । संध्या करते समय गायत्री-मन्त्र का भी जप करने का विधान है । वह हम नीचे उद्धृत करते हैं:—