ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
DevanagariHindipublished380 पृष्ठ
पृष्ठ 325, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 325
ग्रहार्च्य-विज्ञान
३२
ॐ भू भुजः स्वस्तसवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो नः प्रचोदयात् ।
हे सर्वव्यापक, अखिल-गुणसम्पन्न तथा ज्योतिर्मय परमात्म हमारी (सर्वश्रेष्ठ वस्तु) बुद्धि को शुद्ध एवं सद्चिन्तावाली बनाओ इस मंत्र को एक हजार बार, सौ बार या दस बार अवश्य जप लेना चाहिये ।
अब संध्यापासना के लाभों को नीचे लिखते हैं:—
- ( १ ) इससे मन पवित्र और संयमी बन जाता है ।
- ( २ ) भगवद्भक्ति में चिन्ता रमता है ।
- ( ३ ) गुरुतर से गुरुतर भी पाप छूट जाते हैं ।
- ( ४ ) विषय वासनायें तुच्छ ज्ञात होने लगती हैं ।
- ( ५ ) शरीर बलवान्, तेजस्वी और दीर्घजीवी बनता है ।
(११) स्वल्पहार
“शनायोयमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् ।
अपुण्यं लोकविद्धिं, तस्मात्परिवर्जयेत् ।
(चा० नी०)
अति भोजन से अस्वस्थता बढ़ती है—आयुर्वेत् कीय होता है—अनेक रोग पैदा होते हैं—पाप कम होते हैं और लोगों में निंदा होती है । इसलिये अधिक भोजन करना बर्जित है ।
“स्वल्पहारः सुखावहः ।”
(सूक्ति)