ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-रत्ना के ससियमः
थोड़ा आहार करना सुख-द्वायक होता है ।
जीवधारियों के लिये आहार बहुत आवश्यक पदार्थ होता है । पर विशेष होने से यही हासि पहुँचाता है । स्वरूपाहार करने वाले सदा सुखी रहते हैं । विशेष आहार करने वालों को प्रायः स्वप्नदोष से पीड़ित पाया गया है । कुछ लोगों की कुवारापा स्त्री हो गई है कि जितना ही खाया जाय उतना ही अरुद्धा है । बड़े वैशों का कहना है कि थोड़ा ही आहार करना स्वास्थ्य के लिये उपयोगी होता है । प्रत्येक ग्राम ( कबल ) को दांतों से खून मसल कर खाना चाहिये । आहार वसना ही करना चाहिये जितना कि सुगमता से पच सके । विशेष आहार से भजीयों, ज्वर, संमहणी, कोप्रबद्धता और घातु-दोर्बल्य आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । भोजन कर लेने पर पानी और हवा के लिये पेट में काफी स्थान छोड़ देना चाहिये ।
अब हम स्वरूपाहार के गुणों को नीचे लिखते हैं:—
( १ ) शरीर स्वस्थ और नीरोग रहता है ।
( २ ) मन में बल और स्फूर्ति का वास रहता है ।
( ३ ) आलस्य, मिद्रा, अतुल्लाह नाश होता है ।
( ४ ) इससे वीर्यरत्ना में भी बहुत सहायता मिलती है ।