भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

महाचर्य-विज्ञान

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ऊपर लिखी हुई मानसिक योग की क्रिया आँखें मूँद कर भंग की जा सकती है। पर बस अवस्था में भी मानसिक दृष्टि नासिका के अपभ्रंश के लिए ही रहना चाहिये।

जैसे शरीर के लिये भोजन की आवश्यकता होती है, उस प्रकार जीवात्मा के लिये मानसिक योग की आवश्यकता अनिवार्य है।

अब हम इस मानसिक योग से होने वाले कुछ लाभों के वर्णन यहाँ पर करते हैं:—

(१) योग के साधन से मनुष्य का वीर्य नष्ट नहीं होने पाता।

(२) मस्तिष्क और मन में ब्रह्मचर्य की रक्षण-शक्ति प्राप्त होती है।

(३) चित्त की चञ्चलता नष्ट हो जाती है।

(४) उत्तमोत्तम विचार और कार्य की इच्छा होती है।

(५) परमानन्द और शान्ति की उपलब्धि होती है।

(६) सदाचार में सहायता मिलती है।

(७) अधर्म और अनाचार में चित्त नहीं दमता।

(८) सदैव उत्साह, साहस, धैर्य, प्रेम और औदार्य की प्रवृद्धि होती है।

(९) दीर्घ-जीवन और आरोग्य प्राप्त होता है।

(१०) अन्त में मोक्ष भी प्राप्त होता है।

योग के सम्बन्ध में लिये अधिक जानने की इच्छा हो, वा अन्यकर्ता का 'योगाचार-दर्शन' देखे।

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धीर्य-त्वा के सजियम

(१०) सन्ध्यावन्दन

“श्रुतयो दीर्घं सन्ध्यात्वादीर्घमायुखान्युयुः । प्रहो यशश्च कीर्तिञ्च श्रुतचर्चसमेव च ॥”

( ममरुति )

चट्पि लोग देर तक सन्ध्यावन्दन करने के कारण दीर्घायु, खुदछि, सुकीर्ति और ब्रह्मलेज को प्राप्त होते थे ।

सन्ध्यावन्दन की प्रणाली इस देश में बहुत प्राचीन है । हमारी हिन्दू-जनता इसके नाम से भली भाँति परिचित है । यह मनुष्य-जाति के लिये एक बड़ा आवश्यक कर्तव्य है ।

सन्ध्याका अर्थ है एकाग्र चित्त से ध्यान करना, परमेश्वर की वप्रासना करना, अपने दिन भर के किये कामों पर विचार कर उरे कामों के लिये पश्चात्ताप करना, आगे के लिये दुरे काम न करने की प्रतिज्ञा करना, आगे का समय सदुप्यबहारों में व्यतीत हो इसकी परमात्मा से प्रार्थना करना आदि ।

हमारी सन्ध्या में बहुत गूढ़ रहस्य छिपा हुआ है । इसीलिये आवश्यक से आवश्यक कार्य की लोग छोड़ कर इसे करते थे । महाभारत में भी पितामह भीष्म, श्रीकृष्ण, युधिष्ठिर आदि सन्ध्या- पासन करते थे, और सन्ध्या होते ही युद्ध बन्द हो जाता था । इतने से ही सन्ध्या का महत्व जाना जा सकता है । . . . .

संध्या प्रातःकाल और सार्यकाल दो बार अवश्य करना चाहिए । संध्या करते समय गायत्री-मन्त्र का भी जप करने का विधान है । वह हम नीचे उद्धृत करते हैं:—

ग्रहार्च्य-विज्ञान

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ॐ भू भुजः स्वस्तसवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो नः प्रचोदयात् ।

हे सर्वव्यापक, अखिल-गुणसम्पन्न तथा ज्योतिर्मय परमात्म हमारी (सर्वश्रेष्ठ वस्तु) बुद्धि को शुद्ध एवं सद्चिन्तावाली बनाओ इस मंत्र को एक हजार बार, सौ बार या दस बार अवश्य जप लेना चाहिये ।

अब संध्यापासना के लाभों को नीचे लिखते हैं:—

  • ( १ ) इससे मन पवित्र और संयमी बन जाता है ।
  • ( २ ) भगवद्भक्ति में चिन्ता रमता है ।
  • ( ३ ) गुरुतर से गुरुतर भी पाप छूट जाते हैं ।
  • ( ४ ) विषय वासनायें तुच्छ ज्ञात होने लगती हैं ।
  • ( ५ ) शरीर बलवान्, तेजस्वी और दीर्घजीवी बनता है ।

(११) स्वल्पहार

“शनायोयमनायुष्यमस्वर्ग्यं चातिभोजनम् ।

अपुण्यं लोकविद्धिं, तस्मात्परिवर्जयेत् ।

(चा० नी०)

अति भोजन से अस्वस्थता बढ़ती है—आयुर्वेत् कीय होता है—अनेक रोग पैदा होते हैं—पाप कम होते हैं और लोगों में निंदा होती है । इसलिये अधिक भोजन करना बर्जित है ।

“स्वल्पहारः सुखावहः ।”

(सूक्ति)

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वीर्य-रत्ना के ससियमः

थोड़ा आहार करना सुख-द्वायक होता है ।

जीवधारियों के लिये आहार बहुत आवश्यक पदार्थ होता है । पर विशेष होने से यही हासि पहुँचाता है । स्वरूपाहार करने वाले सदा सुखी रहते हैं । विशेष आहार करने वालों को प्रायः स्वप्नदोष से पीड़ित पाया गया है । कुछ लोगों की कुवारापा स्त्री हो गई है कि जितना ही खाया जाय उतना ही अरुद्धा है । बड़े वैशों का कहना है कि थोड़ा ही आहार करना स्वास्थ्य के लिये उपयोगी होता है । प्रत्येक ग्राम ( कबल ) को दांतों से खून मसल कर खाना चाहिये । आहार वसना ही करना चाहिये जितना कि सुगमता से पच सके । विशेष आहार से भजीयों, ज्वर, संमहणी, कोप्रबद्धता और घातु-दोर्बल्य आदि अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । भोजन कर लेने पर पानी और हवा के लिये पेट में काफी स्थान छोड़ देना चाहिये ।

अब हम स्वरूपाहार के गुणों को नीचे लिखते हैं:—

( १ ) शरीर स्वस्थ और नीरोग रहता है ।

( २ ) मन में बल और स्फूर्ति का वास रहता है ।

( ३ ) आलस्य, मिद्रा, अतुल्लाह नाश होता है ।

( ४ ) इससे वीर्यरत्ना में भी बहुत सहायता मिलती है ।

प्रश्नचर्य-विज्ञान

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(१२) सात्विक भोजन

आयुः सत्त्वश्लोकोर्यं, सुखभीतिविवर्द्धनाः ।

रस्याः स्निग्धास्थिरा हृद्या आहाराः सात्विकप्रियाः ॥

( भगवद्गीता )

जो आहार आयुष्य, ओज, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति के बढ़ाने वाला हो और जो सरस, चिकना, शुद्ध तथा रुचि-बर्द्धक हो वह सात्विक लोगों को प्रिय होता है ।

प्रश्नचर्य पालन करने वालों को आहार पर बहुत ध्यान देना चाहिये । तामस आहार से कभी वीर्य-रक्षा नहीं हो सकती । सात्विक आहार करते रहने से मानसिक वृद्धि भी सात्विक ब जाती है ।

( १ ) सात्विक आहार से शरीर की सब धातुओं को लाभ पहुँचता है । ( २ ) बुद्धि और शक्ति बढ़ती है । ( ३ ) काम क्रोध, मद, लोभ और मोह का नाश होता है । ( ४ ) स्वारस्य और जीवनी-शक्ति की वृद्धि होती है ।

१३—फलआहार

वैद्यक शास्त्रों में फलआहार के अपरिमित लाभों का वर्णन है इस बात को प्रायः सभी लोग जानते होंगे कि हमारे ऋषि-मुनि फलआहारी होते थे । बहुत से लोग ऐसी भी हुए हैं कि जिन्होंने फल या मूलों के अतिरिक्त कुछ भी नहीं खाया है । दूसरा ऋषि दूध ही खाकर बहुत दिनों तक जीवित रहे ।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम्

फलों में प्राकृतिकता विशेष है। बहुत से वैद्य लोग बड़े बड़े रोगियों को फल खाने की सलाह देते हैं। एकादशी जैसे कई उपवास प्रभों में भी लोग फल खाकर रह जाते हैं। भोजन कर लेने के पश्चात् फल खाना बहुत आवश्यक है। जो लोग काम-विकारों से विशेष पीड़ित हों, वे कुछ दिनों तक फल खाकर ही रहें। जो फल जिस च्छु में होता है, वह उस च्छु में अधिक लाभ-कारी होता है। वीर्य-रत्ना के लिये फलों का खाना भी बहुत लाभ-दायक है।

अब हम फलाहार से होने वाले कतिपय लाभों को नीचे लिखते हैं:—

( १ ) फलाहार से स्वास्थ्य, दीर्घायु, बल और बुद्धि की बढ़ती होती है।

( २ ) कोष्ठशुद्धता, निर्बलता, मल-विकार, ज्वर तथा अन्य रोगों से रक्षा होती है।

( ३ ) मन शान्त होकर सत्कर्मों में लगता है।

( ४ ) वीर्य पुष्ट होता है, काम-शक्ति की प्रेरणा दब जाती है, और इन्द्रियों पर विजय मिलती है।

(१४) दुग्ध-पान

इस संसार में यदि कोई पदार्थ अमृत कहलाने योग्य है तो वह दुग्ध ही है। प्रायः सभी वैद्यक शास्त्रों के रचयिताओं ने इस की प्रशंसा की है। पाश्चात्य देश के कई डाक्टर लोग केवल दुग्ध से ही कई रोगों को दूर करते हैं।

अध्यायार्थ विज्ञान

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वास्तव में दूध से बहुकर कोई खाने-पीने योग्य पदार्थ है। नहीं। यही कारण है कि इस देश के ऋषि-महर्षि तक अपास गौ रखते थे। यह बड़ा ही सात्विक आहार है।

केवल दूध पीकर भी कई दिनों तक रहा जा सकता है। ७ लोग यह ख्याल करते हों कि दूध पीने से बीर्य-रत्ना नहीं हो सकते वे भूल करते हैं। थोड़ा सा धारोष्ण दूध पीना बड़ा ही हितक होता है। इस दूध से काम-विकार उत्पन्न नहीं होता। ताप निकला हुआ दूध बहुत गुणकारी होता है। शास्त्रों में लिखा है:— “पीयूषोऽभिनवे पय।”

तुरन्त के लुहे हुए दूध का नाम ही पीयूष है। इस विषय : गौ का दूध ही मान्य है। जिस आदि के दूध में वह बात नहीं जिस का दूध तमोगुण बढ़ाता है। वह विषय की उत्तेजना भी प्रका करता है।

अब हम दुग्धपान से होने वाले कुछ गुणों को नीचे देते हैं:

(१) गौ का धारोष्ण दूध थोड़ा सा प्रातःकाल पीने से मन को शान्ति मिलती है। (२) पवित्र लुछि, साक्षाहस, पदुमे पदुमे में उत्साह, धार्मिक विचार तथा आनन्द उत्पन्न होता है। (३) कई प्रकार के धातु सम्बन्धी रोग नष्ट हो जाते हैं। (४) चीणता, हास तथा अन्य दोषों को नष्ट कर हृदय, मस्तिष्क तथा सर्वोच्च पुष्ट तथा तेजस्वी बनता है। (५) न्यर्थ की उत्तेजना शान्त करता है।

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दीर्घ-रत्ना के सविनयम

(१५) सत्संग

‘सत्संगतिः कथय किञ् करोति पुन्त्ताम् ।’

(सूक्ति)

सज्जानों की संगति पुरुष को क्या नहीं बना सकती ।

‘तातः । स्वर्गं अपूर्णं सुखं, धरिय तुला पक् अंग ।

तुले न ताहि सकल भिलु, जो सुख लव सत संग ॥

(रामायण)

सत्सङ्ग की महिमा प्रायः सभी वेद-पुराणों में गाई और दिखलाई गई है । बड़े बड़े पापी और कुविचारी लोग सत्सङ्ग के प्रभाव से महात्मा और मुक्त हो गये हैं । जैसे लोहा पारस के छूने से सोना बन जाता है, वैसे ही नीच मनुष्य भी सत्सङ्ग पाते ही सुजन हो जाता है ।

सङ्ग का प्रभाव बड़ा ही अदृष्ट होता है । जैसा सङ्ग होता है, वैसा ही भला बुरा उसका प्रभाव भी होता है । कुसङ्ग में पड़ कर बहुत से लोग अपने जीवन को नरकमय बना डालते हैं । इसी लिये गोस्वामी तुलसीदासजी ने लिखा है :—

चक्र भल चास नरक कर ताता । दुष्ट संग जनि देह विघाता ॥

कुसङ्ग में पड़ कर अपने को सदाचारी और संयमी बनाये रखना लोहे के चना चवाने के समान है । अच्छे से अच्छे पुरुष को भी इस बात का अभिमान न करना चाहिए कि वह खलों की भण्डली में घुस कर अपना धर्म निशा सकेगा । क्योंकि ऐसा करना विपत्तन कर जीवित रहने की आशा करने की भाँति है । अतः एव जो लोग दीर्घ-रत्ना के प्रेमी हों, वे सदैव कुसङ्ग से दूर रहें ।

अब हम कुछ सत्सङ्ग के लाभों को नीचे लिखते हैं :—

महाचर्य-विज्ञान

( १ ) सत्सङ्ग से मन का अविवेक छूट जाता है, और स बुद्धि का उदय होता है । ( २ ) शारीरिक और मानसिक ऊर्जा की शिक्षा मिलती रहती है । ( ३ ) सांसारिक प्रपञ्चों से जी-सुक हो जाता है । ( ४ ) भगवद्भक्ति, कृतज्ञता और परीपक्वा-के भाव दृढ़ हो जाते हैं । ( ५ ) भोग-बिलास की निःसारता प्र-हो जाती है ।

( १६ ) सद्गुणग्रन्थों का पाठ

सद्गुणग्रन्थवाचन परो भव पित्त नित्यम् ।

हे मित्र ! अच्छे ग्रन्थों के पढ़नेवाले बनो ! ( सृष्टि

यथास्ति सद्गुणग्रन्थ विमर्शे भाग्यं ।

किं तस्य शुक्लैश्वरपला चिन्तोदः । ( सृष्टि

जिसके भाग्य में उन्मादोत्तम ग्रन्थों का अनुशीलन करना व है, उसके लिये लक्ष्मी के छुप्क विनोद किस काम के ।

सद्गुणग्रन्थ मनुष्य के सब-से श्रेष्ठ मित्र हैं । ये ऐसे मित्र कि प्रत्येक समय में हृदय को शान्ति प्रदान करते हैं । आज त जितने महात्मा हुए हैं, प्रायः सब पर इतका प्रभाव पड़ा है । इन के कारण ज्ञान का कोष संसार में सुरक्षित है । जिसने इनकी अ राधना की उसे कुछ न कुछ अवश्य मिला ।

वास्तव में सद्गुणग्रन्थों की सहिमा अपार है । यही कारण कि कवि, तत्ववेत्ता, विरक्त, योगी, साधु, भक्त तथा अनुरक्त लो

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम

इनको पढ़ कर अभीष्ट फल प्राप्त करते हैं । इनका संग्रह धन के संग्रह से भी कहीं बढ़कर होता है । मनुष्य-जाति इन्हों की सहायता से सर्वोन्नति कर सकता है । कुविचारियों के भी विचार गढ़ पलट जाते हैं ।

• आजकल अश्लील तथा लज्जाजनक उपन्यासों के प्रचार से समाज की बड़ी दुर्गति हो रही है । विचारियों के दुराचारी होने का बहुत कुछ कलङ्क इनके सिर पर भी लगाया जा सकता है । घुरे साहित्य के प्रचार से समाज में दुराचार तथा न्यमिचार की वृद्धि होती है । इन घुरे ग्रन्थों से ब्रह्मचर्य का अधिक रूप से हास हो रहा है ।

अतः जो लोग वीर्य-रत्ना करना चाहें, वे घुरे ग्रन्थों से अवश्य बचें । और अपने अवकाश के समय में सदाचार, नीति, धर्म, जीवनचरित्र तथा गन्धीर विषयों के, जैसे रामायण, गीता, योग वाशिष्ठ, मनुस्मृति, दर्शन-शास्त्र तथा स्त्रा० विवेकानन्द, श्रृ० द्या-नन्द, स्त्रा० रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस, तुकारामजी आदि के उत्तमोत्तम ग्रन्थों के पढ़ने में मन लगावें । पढ़ने का क्रम नित्य होना बहुत ही उपदेय होता है ।

(१) सद्ग्रन्थों के निरन्तर पाठ से कर्मनिष्ठा, प्रसन्नता, भीरता, सेवा-शक्ति, दया और गुणमाहकता की वृद्धि होती है ।

(२) चिन्ता, भय, पराधीनता, द्वेष तथा अहङ्कार से रक्षा होती है ।

(३) मन और मस्तिष्क को दृढ़ता और शान्ति मिलती है ।

तथा (४) मनुष्य व्यथोगी और परिश्रमी बन जाता है ।

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ग्रन्थस्ये-विज्ञान

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(१७) नियम-बद्धता

मनुष्य-जीवन को सुख और शान्तिमय बनाने में नियम-बद्ध का बहुत बड़ा हाथ होता है। जो लोग नियम से अपने फाम कर वाले नहीं होते, वे कभी उच्च और आदर्श पुरुष नहीं बन सकते। भारतवर्ष में और विरोध कर हिन्दू-जाति में अब नियम बद्धता को बहुत कम महत्व दिया जा रहा है। यहाँ की अपेक्षा पाश्चात्य देशवासी बहुत ही नियम-बद्ध होते हैं। यही कारण। कि वे विरोध करके स्वस्थ, उद्योगी, साहसी, मेधावी और हा प्रतिष्ठ होते हैं। अनियमित पुरुष कभी किसी कार्य में पूर्ण रूप से सफल नहीं हो सकता। अतः वीर्य-रक्षा के प्रेमियों को चाहिं कि नियम-बद्ध होने का सब से पहले उद्योग करें।

जैसा कुछ नियम बनाया गया हो, उसे उचित समय पर व्यवहार में लाने का नाम 'नियम-बद्धता' है। प्रत्येक मनुष्य को चाहिये कि वह अपनी शारीरिक और मानसिक ऊर्जा के लिए कुछ न कुछ विचार-पूर्ण उपयोगी नियम बना ले और फिर उनके अनुसार चलने का पूरा प्रयत्न करे।

(१) नियम-बद्धता से मनुष्य अपनी सब प्रकार की ऊर्जा कर सकता है। अपने अंगीकृत कामों को पूरा कर सकता है।

(२) उद्योग-शीलता, कर्तव्यपरायणता, दृढ़ता और कार्य-कारित में मन लगता है। (३) विद्या और चत का संग्रह किया जा सकता है। और (४) विषय-भोगों की ओर चित्त नहीं दीढ़ता।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम्

(१८) शिव-सङ्कल्प

‘हमृतिष्टां अजिर्न जविष्टां तन्मैमनः शिव सङ्कल्पमस्तु ।

( यजुर्वेद )

‘सर्वे सङ्कल्पजाः स्मृताः ।’

( भगवत्सुति )

सभी उत्तमोत्तम कार्य सङ्कल्प से ही होते हैं ।

सङ्कल्पेन विना राजन्, यत्किञ्चित्कुरुते नष्टः ।

फलस्याल्पाल्पकं तस्य, धर्मस्याध्वन्यं भवेत् ॥

( पद्मपुराण )

हे राजन् ! सङ्कल्प के विना जो कृष्ट किया जाता है, उसका फल बहुत कम होता है, और उसके धर्म का आधा भाग नष्ट हो जाता है ।

हिन्दू-धर्म में प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ करने में सङ्कल्प करना पड़ता है । इस कृत्य में बहुत बड़ा तत्त्व छिपा हुआ है । सङ्कल्प-हीन कार्यों की पूर्ति में सन्देह रहता है । वीर्य-रत्नाजी भी एक प्रकार का व्रत है । जिसमें दृढ़ सङ्कल्प नहीं, वह इसमें कभी सफल नहीं हो सकता । सङ्कल्प के अनुसार ही शुभाशुभ कार्य भी होता है । इसलिये सदैव अपने सङ्कल्प को शुभ रखना चाहिये ।

सङ्कल्प इस प्रकार का होना चाहिये :—

मैं आज से ब्रह्मचर्य ( वीर्य-रत्ना ) में दत्तविद्या रहूँगा । न्यमिचार से सदैव घृणा करता रहूँगा । मैं पर-की पर कुट्टि न डालूँगा । मैं अपनी पत्नी से ही सन्तुष्ट रहूँगा । मैं अपनी मानसिक और शारीरिक उन्नति करूँगा । मैं परमात्मा और धर्म को छोड़कर किसी से न डरूँगा इत्यादि ।

प्राप्त्यर्थ-विज्ञान

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अब हम शुभ सङ्कल्प से होने वाले कतिपय लाभों को नीचे लिखते हैं:—

( १ ) शुभ सङ्कल्प से कार्य के करने में असफलता का भय नहीं रहता । ( २ ) मन को दृढ़ता प्राप्त होती है । ( ३ ) वाधाओं के सहने की शक्ति प्राप्त होती है । ( ४ ) कर्तव्य से विमुख होने की इच्छा नहीं होती । ( ५ ) स्वाधीन विचार जागृत हो जाते हैं ।

( १६ ) इच्छा-शक्ति-प्रयोग

आकृति देवीं सुभगां पुरो दधे । चिन्तस्य माता सुवह्ना ना श्रुतु ॥

( अथर्ववेद )

हम इच्छा-शक्ति देवी की उपासना करते हैं । वह चित्त की माता है । अतः हमारे लिये सुखदायिनी धने !

“अकामस्य क्रिया काचिद्, दश्यते नेह कर्हिचित् ।”

( मनुष्यसूति )

मनः कामना के बिना इस संसार में कोई कार्य नहीं हो सकता ।

‘या दगिच्छेच्छ भवितु, तादृगभवति पुरुषः ।’

( म० विदुर )

पुरुष जैसा होने की इच्छा करता है, वैसा बनता है ।

इच्छा-शक्ति का नाम विद्यान् लोगों ने सुना ही होगा ? मनुष्य के भीतर यह दैवी-विभूति छिपी हुई है । जो लोग इसके

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम

अनमोल गुणों को जानते हैं, वे इसको उन्नत करने का अभ्यास भी करते हैं।

प्राचीन समय में इस देश के ऋषि-मुनि इस इच्छा-शक्ति से बहुत कुछ काम लेते थे। इसके चल पर कठोर से कठोर त्रस की साधना में सफल होते थे। अब भी कुछ लोग इच्छा-शक्ति से लाभ उठाते हैं। इसका यह गुण है कि यह विषय प्रेरित की जाती है, उधर ही कार्य कर बैठती है। इसे न जानने वाले लोग अहानवश इससे अनुचित कार्य भी ले लेते हैं। इस प्रकार वह मन्द हो जाती है। अतएव इसे चलवती बनाने का सदुप्यास करना चाहिये। वीर्य-रत्ना के प्रेमी इससे बहुत कुछ लाभ उठा सकते हैं। शान्त चिरा हो कर एकान्त में इसका प्रयोग नित्य करने से बड़ा हित होता है। अपनी इच्छा को खींच कर किसी सत्कार्य के सम्पादन में लगाना चाहिये। ऐसे समय में मन में उसी वस्तु का चिन्तन करना चाहिये। अपने हृदय में या वाणी से कह कर उसकी दृढ़ता निम्नलिखित वाक्यों में करना चाहिये:—

वीर्य-रत्ना में श्रवण्य सफल हो रहा हूँ। यह मेरे लिये कोई कठिन काम नहीं। काम विकारों पर मेरा अधिकार हो गया है। दृष्टा की वास्तव्य मुझे नहीं सता सकती। स्वप्न में भी मेरी इच्छा के विरुद्ध एक विन्दु वीर्य का पतन नहीं हो सकता। मेरा मन सदा-चांग में रम रहा है। कोई ऐसी शक्ति नहीं, जो मुझे धृष्टित कार्यों में फँसा दे दृष्ट्यादि।

इच्छा-शक्ति के प्रयोग से होने वाले कुछ लाभ नीचे लिखे जाते हैं:—

(१) मन अधिकार में हो जाता है। (२) दिन-रात

प्राप्तार्थ-विधान

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प्रसन्नता और धीरता रहती है। ( ३ ) कर्तव्य-प्राप्ति में सफल होती है। एवं ( ४ ) स्वस्थता और जीवनी-शक्ति बढ़ती है।

( २० ) सदभ्यास

अतिशय रंगर फरे जो कोई । अनल प्रकट चन्दन ते होई ॥

(रामाय)

‘अभ्यासात्फल ममनुते ।’

अभ्यास के द्वारा कर्तव्य का फल मिलता है।

अभ्यास की श्रेष्ठता शब्दों से कह कर नहीं बतलाई सकती। अभ्यास ही बढ़कर फल के रूप में परिणत हो जा है। जैसे जो विद्यार्थी व्याकरण का आचार्य बनना चाहे, उ व्याकरण का नियमित रूप से अभ्यास करना पड़ता है। या वह पढ़ने का अभ्यास न करे, तो सफल नहीं हो सकता। इसलि जो लोग ब्रह्मचारी बनना चाहें, वे भी वीर्य-रक्षा का अभ्यास करें पहले पहल असफल होने पर भी अभ्यास को न छोड़ना चाहिये केवल मन में ही सोच लेने से काम नहीं चलता। अभ्यास ही उसके साधन को मूल है। जिसकी इन्द्रियलोलुपता बढ़ गई है और उसका छटना कठिन हो गया हो, उसे भी हतारा हो कर बैठ जाना चाहिये। बल्कि उससे छटने के उपायों का निरन्तर अभ्यास

ॐ इस विषय में अधिक जानने के लिये लेखक की ‘ब्रह्म-ज्ञाति नामक पुस्तक देखनी चाहिये।

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धोय-रत्ना के सजियम

करना चाहिये और हम विन्यास दिताते हैं कि कुछ ही दिनों में उसका अभ्यास पुष्ट होने ही उसकी विनय होगी और उसकी इन्द्रिय-लौकुपता अवश्य दब जायगी ।

किसी बात का अभ्यास भी धीरे-धीरे करना चाहिये । एकदम करने से हानि होती है और अभ्यास भी छुट जाता है । अभ्यास की ओर सदैव सचेष्ट रहना चाहिये । जो दुर्गुण जान पड़ें, उन्हें छोड़ने और सदुगुणों को ग्रहण करने में भी धीरे-धीरे अभ्यास किया जा सकता है ।

अब हम अभ्यास से होने वाले कुछ गुणों को नीचे लिखते हैं:—

( १ ) अभ्यास से साधना सफल होती है । ( २ ) मनुष्य स्वात्माबलम्भी बन जाता है । ( ३ ) कुछ ही दिनों में सदुगुणों की बुद्धि होती है । ( ४ ) मन में प्रसन्नता होती है तथा ( ५ ) घुरे कार्यों के लिये अवकाश नहीं मिलता ।

(२१) वैराग्य

सर्वं परिग्रहः योग-त्यागः ।

कस्य सुखं न करोति विरागः ।

( शङ्कराचार्य )

सब प्रकार की तृष्णा और भोगों को छोड़ देना इस प्रकार का वैराग्य भला किसे सुख नहीं देता ?

इस देश के प्राचीन निवासी गृहस्थाश्रम में रह कर भी वैरागी होते थे । विदेह जनक ऐसे ही वैरागी थे । इसका फल यह

दृष्टान्तचर्य-विज्ञान

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होता था कि माया उन पर पूर्ण रूप से अधिकार जमाकर अन नहीं करा सकती थी ।

वास्तव में जब तक हृदय में वैराग्य-भाव जड़ नहीं ज लेता, विषय-वासनायें उसका पीछा छोड़ती ही नहीं । काम, क्रोध और लोभ आदि के घटाने के लिये वैराग्य ही समर्थ हो है । ब्रह्मचर्य का नारा न होने देनेवालों को वैराग्य में अवभाग लेना चाहिये । वैराग्य युक्त मन बनाने के लिये इस प्रकृति विचार करना चाहिये:—

यह संसार ही असाद है । पुराय ही यहाँ सब कुछ है पापियों को नरक भोगना पड़ता है । विषय-भोग में वास्तविक सुख नहीं । अज्ञानता में पड़ कर किसी प्रकार का व्यभिचान करना चाहिये । कोई अमर नहीं होने आया है । जीवन, धन और जीवन थोड़े ही दिनों तक रहते हैं । अतएव इनका अगि मान न करना चाहिये । यह मनुष्य-देह ही अपने स्वार्थ-साधन लिये नहीं मिली है । यह दूसरों की सेवा करने के लिये मिल है । सुस्ने अपने तन, मन, धन आर्यात् सर्वस्व धर्म-सेव देश सेवा के लिये अर्पण कर देना चाहिये ।

(२२) परिश्रम और उत्साह

‘उत्साह वन्तः पुरुषा, नावसीदन्ति कर्हिचित् ।’

( वा० रामायण )

उत्साही पुरुषों को कभी कष्ट नहीं हो सकता ।

परिश्रम और उत्साह में बड़ा धनिष्ठ सम्बन्ध है । परिश्रम और उत्साह से संसार के सारे कार्य सम्पादित होते हैं ।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम

दिन-रात परिश्रम में लगे रहने से विषय-वासनायें नहीं सवार्यो। निरुद्यमी लोगों को ही विलासिता में आनन्द मिलता है। उत्साही पुरुष कभी आलसी होकर नहीं बैठ सकता। उसका मन सदैव ऊँचे से ऊँचे कार्य के सञ्चालन में लगा रहता है। इसलिये उसे भोग-विलास की बातों में पड़ने का अवसर ही नहीं मिलता। जो लोग अपने वीर्य की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें कभी निरुद्यमी और अनुत्साही धन कर न रहना चाहिये। क्योंकि आलस्य-ही शैवान का घर है। निरुद्यमी रहने से सदा कुविचार उत्पन्न होने रहते हैं। अतएव सब लोगों को परिश्रमी और उत्साही बनने का प्रयत्न करना चाहिये।

( २३ ) सन्ध्वी श्रद्धा

‘यो यच्छद्धः स एव सः।’

(भगवद्गीता)

जो जैसी श्रद्धा रखता है, वह वैसा ही बनता है।

बिना सन्ध्वी श्रद्धा के मनुष्य किसी भी कार्य को सुचारुता से नहीं कर सकता। अश्रद्धा होने से कर्तव्य-पालन में मन ही नहीं लगता और उसके कार्य में भी सफलता नहीं मिलती।

वीर्य-रत्ना के लिये भी सन्ध्वी श्रद्धा की आवश्यकता होती है। जो पुरुष श्रद्धाचार्य के प्रति अपने हृदय में सन्ध्वी श्रद्धा नहीं रखता, वह कभी संयम नहीं कर सकता। श्रद्धालु पुरुष ही इस पच्छद व्रत का पालन कर सकता है। इसलिये जो लोग वीर्य-

प्रश्नोत्तर-विज्ञान

3

रक्क बनना चाहते हैं, उन्हें चाहिये कि पहले पहल उसके श्रद्धालु बनें।

सच्ची श्रद्धा से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

(१) सच्ची श्रद्धा से कोई भी कार्य सरलता से सिद्ध जाता है। (२) मन में उत्साह रहता है। (३) प्रसन्नता उत्पन्न रहती है। (४) दुर्गुणों का नाश होता है। और (५) प्रकार के सुधार और आत्म-संयम हो सकते हैं।

(२४) दृढ़ विश्वास

'विश्वासः फल दायकः।'

(सि)

विश्वास फल का देने वाला होता है।

विश्वास के बिना प्रत्येक कार्य के करने में भय प्रतीत हो है। और भय के हो जाने से उसकी पूर्ति के लिये उचित उद्ये नहीं होता। अविश्वास के कारण हमने कई लोगों को साधारण साधारण कार्य में असफल होते देखा है, और कठिन से कठिन कार्य में भी अपने विश्वास के कारण लोग सफल हुये हैं। धी रचा के लिये भी दृढ़ विश्वास की नितान्त आवश्यकता होती है इस बात का प्रति समझ विश्वास रखना चाहिये कि हम अवश्य इस व्रत में सफल होंगे। फिर किसी भाँति का भय नहीं सकता। कष्टों के पड़ने पर भी विश्वास को दृढ़ रखना चाहिये दृढ़ विश्वास से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

(१) दृढ़ विश्वास से कार्य-साधन में सफलता मिलती है।

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वीर्य-रत्ना के सजियम

॥(२) हृदय में स्वाभाविक शान्ति रहती है। (३) मनुष्य धरत्ता से कार्यों में लगा रहता है। (४) उद्योग में कमी नहीं होती। एवं (५) सद्चित्तों की उत्पत्ति होती है।

(२५) विश्व-प्रेम

‘उदार चरितानांतु, वसुधैव कुटुम्बकम् ।’

जो उदार चरित्र वाले पुरुष हैं, वे संसार को अपना कुटुम्बी मानते हैं।

विश्व-प्रेम बड़ी है, जिसमें कि अपने-परारेषण का भेद-भाव नहीं रह जाता। ऐसे प्रेमी का हृदय शुद्ध और सरल हो जाता है। उसके विचार श्रेष्ठ और पवित्र हो जाते हैं। इसी से वह संसार के स्त्री-पुरुषों को अपना कुटुम्बी समझता है। ऐसा कदाचित् ही कोई नीच मनुष्य हो, जो अपने कुटुम्बियों के प्रति दुर्भाव रखता हो और उनका अहित चाहता हो ! विश्व-प्रेमी के हृदय में अन्य किसी स्त्री पर कुछि फेरने का विकार ही नहीं उठ सकता। वह तो अधम और अन्यायियों को भी सदाचारी और चरित्रवान् तथा कुलदा और दयभिवारिणी को साध्वी और सदाचारिणी बनाने का प्रयत्न करता रहता है। वह सुख और शान्ति के लिये वायु-मण्डल को ही प्रक्षपयैमय देखना चाहता है। उसके विश्व-प्रेम का यह अन्तिम ध्येय होता है। फिर ऐसा पुरुष वीर्य-रत्ना में अपने को निश्चाय रूप से समर्थ बना सकता है।

अतएव ऐसी उद्वभावना सदा मन में रखनी चाहिये।