ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-रत्ना के सन्निधम
दिन-रात परिश्रम में लगे रहने से विषय-वासनायें नहीं सवार्यो। निरुद्यमी लोगों को ही विलासिता में आनन्द मिलता है। उत्साही पुरुष कभी आलसी होकर नहीं बैठ सकता। उसका मन सदैव ऊँचे से ऊँचे कार्य के सञ्चालन में लगा रहता है। इसलिये उसे भोग-विलास की बातों में पड़ने का अवसर ही नहीं मिलता। जो लोग अपने वीर्य की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें कभी निरुद्यमी और अनुत्साही धन कर न रहना चाहिये। क्योंकि आलस्य-ही शैवान का घर है। निरुद्यमी रहने से सदा कुविचार उत्पन्न होने रहते हैं। अतएव सब लोगों को परिश्रमी और उत्साही बनने का प्रयत्न करना चाहिये।
( २३ ) सन्ध्वी श्रद्धा
‘यो यच्छद्धः स एव सः।’
(भगवद्गीता)
जो जैसी श्रद्धा रखता है, वह वैसा ही बनता है।
बिना सन्ध्वी श्रद्धा के मनुष्य किसी भी कार्य को सुचारुता से नहीं कर सकता। अश्रद्धा होने से कर्तव्य-पालन में मन ही नहीं लगता और उसके कार्य में भी सफलता नहीं मिलती।
वीर्य-रत्ना के लिये भी सन्ध्वी श्रद्धा की आवश्यकता होती है। जो पुरुष श्रद्धाचार्य के प्रति अपने हृदय में सन्ध्वी श्रद्धा नहीं रखता, वह कभी संयम नहीं कर सकता। श्रद्धालु पुरुष ही इस पच्छद व्रत का पालन कर सकता है। इसलिये जो लोग वीर्य-