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ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम

दिन-रात परिश्रम में लगे रहने से विषय-वासनायें नहीं सवार्यो। निरुद्यमी लोगों को ही विलासिता में आनन्द मिलता है। उत्साही पुरुष कभी आलसी होकर नहीं बैठ सकता। उसका मन सदैव ऊँचे से ऊँचे कार्य के सञ्चालन में लगा रहता है। इसलिये उसे भोग-विलास की बातों में पड़ने का अवसर ही नहीं मिलता। जो लोग अपने वीर्य की रक्षा करना चाहते हैं, उन्हें कभी निरुद्यमी और अनुत्साही धन कर न रहना चाहिये। क्योंकि आलस्य-ही शैवान का घर है। निरुद्यमी रहने से सदा कुविचार उत्पन्न होने रहते हैं। अतएव सब लोगों को परिश्रमी और उत्साही बनने का प्रयत्न करना चाहिये।

( २३ ) सन्ध्वी श्रद्धा

‘यो यच्छद्धः स एव सः।’

(भगवद्गीता)

जो जैसी श्रद्धा रखता है, वह वैसा ही बनता है।

बिना सन्ध्वी श्रद्धा के मनुष्य किसी भी कार्य को सुचारुता से नहीं कर सकता। अश्रद्धा होने से कर्तव्य-पालन में मन ही नहीं लगता और उसके कार्य में भी सफलता नहीं मिलती।

वीर्य-रत्ना के लिये भी सन्ध्वी श्रद्धा की आवश्यकता होती है। जो पुरुष श्रद्धाचार्य के प्रति अपने हृदय में सन्ध्वी श्रद्धा नहीं रखता, वह कभी संयम नहीं कर सकता। श्रद्धालु पुरुष ही इस पच्छद व्रत का पालन कर सकता है। इसलिये जो लोग वीर्य-

प्रश्नोत्तर-विज्ञान

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रक्क बनना चाहते हैं, उन्हें चाहिये कि पहले पहल उसके श्रद्धालु बनें।

सच्ची श्रद्धा से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

(१) सच्ची श्रद्धा से कोई भी कार्य सरलता से सिद्ध जाता है। (२) मन में उत्साह रहता है। (३) प्रसन्नता उत्पन्न रहती है। (४) दुर्गुणों का नाश होता है। और (५) प्रकार के सुधार और आत्म-संयम हो सकते हैं।

(२४) दृढ़ विश्वास

'विश्वासः फल दायकः।'

(सि)

विश्वास फल का देने वाला होता है।

विश्वास के बिना प्रत्येक कार्य के करने में भय प्रतीत हो है। और भय के हो जाने से उसकी पूर्ति के लिये उचित उद्ये नहीं होता। अविश्वास के कारण हमने कई लोगों को साधारण साधारण कार्य में असफल होते देखा है, और कठिन से कठिन कार्य में भी अपने विश्वास के कारण लोग सफल हुये हैं। धी रचा के लिये भी दृढ़ विश्वास की नितान्त आवश्यकता होती है इस बात का प्रति समझ विश्वास रखना चाहिये कि हम अवश्य इस व्रत में सफल होंगे। फिर किसी भाँति का भय नहीं सकता। कष्टों के पड़ने पर भी विश्वास को दृढ़ रखना चाहिये दृढ़ विश्वास से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

(१) दृढ़ विश्वास से कार्य-साधन में सफलता मिलती है।

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वीर्य-रत्ना के सजियम

॥(२) हृदय में स्वाभाविक शान्ति रहती है। (३) मनुष्य धरत्ता से कार्यों में लगा रहता है। (४) उद्योग में कमी नहीं होती। एवं (५) सद्चित्तों की उत्पत्ति होती है।

(२५) विश्व-प्रेम

‘उदार चरितानांतु, वसुधैव कुटुम्बकम् ।’

जो उदार चरित्र वाले पुरुष हैं, वे संसार को अपना कुटुम्बी मानते हैं।

विश्व-प्रेम बड़ी है, जिसमें कि अपने-परारेषण का भेद-भाव नहीं रह जाता। ऐसे प्रेमी का हृदय शुद्ध और सरल हो जाता है। उसके विचार श्रेष्ठ और पवित्र हो जाते हैं। इसी से वह संसार के स्त्री-पुरुषों को अपना कुटुम्बी समझता है। ऐसा कदाचित् ही कोई नीच मनुष्य हो, जो अपने कुटुम्बियों के प्रति दुर्भाव रखता हो और उनका अहित चाहता हो ! विश्व-प्रेमी के हृदय में अन्य किसी स्त्री पर कुछि फेरने का विकार ही नहीं उठ सकता। वह तो अधम और अन्यायियों को भी सदाचारी और चरित्रवान् तथा कुलदा और दयभिवारिणी को साध्वी और सदाचारिणी बनाने का प्रयत्न करता रहता है। वह सुख और शान्ति के लिये वायु-मण्डल को ही प्रक्षपयैमय देखना चाहता है। उसके विश्व-प्रेम का यह अन्तिम ध्येय होता है। फिर ऐसा पुरुष वीर्य-रत्ना में अपने को निश्चाय रूप से समर्थ बना सकता है।

अतएव ऐसी उद्वभावना सदा मन में रखनी चाहिये।

ऋग्वेद-विज्ञान

( २६ ) खड़ाऊ पहनना

वीर्य-रत्ना के लिये खड़ाऊ पहनना बड़ा श्रेयस्कर सिद्ध है। यही कारण है कि ऋग्वेद की दीक्षा के समय बालक पाहुका ( खड़ाऊ) पहना दो जाती है। बहुत से सन्थासिय भी हमने सदा खड़ाऊ पहनते हुये देखा है। खड़ाऊ काठ की होती है। इसकी पवित्रता में तो कोई सन्देह ही नहीं। पिंदिन-रात में आवश्यकता पड़ने पर जल से धोई भी जा सकता है। ये दोनों पैरों में पहनी जाती हैं और इनकी दोनों हैं दोनों अंगुठों की मोटी नसों को दबाती हैं। इन नसों और जननेन्द्रिय का बड़ा भारी सम्बन्ध है। इनकी दाब से इंद्रिय में व्यर्थ और असमय में उठने वाली उत्तेजना दबती है। इनका प्रभाव मस्तिष्क तक पड़ता है। इसलिये काम-ग्री भी वाधा नहीं पहुँचाने पाते। पाहुका के गुणों को इसके अर्थ स्वयं जान सकते हैं।

नित्य की पहनने वाली पाहुकायें पुष्ट लकड़ी की घनी हलकी होती चाहिये। उनकी खूंटियाँ गोल, बड़ी और नीचे ढ़िदार रहें। इसके विरुद्ध रहने से आँखों को हानि पहुँचती है जूते की अपेक्षा खड़ाऊ के पहनने में विशेष सरलता सुविधा होती है। खर्च भी कम पड़ता है। धर्म की रत्ना है। जूते पहननेवालों के पैरों में बड़ी वद्वृद्धि होती है और इसलिये नाना प्रकार के रोग उससे शरीर में पैदा हो जाते ऋग्वेद-पालन करने वालों के लिये पाहुका-धारण बहुत होला है। इस सम्बन्ध में हमारा स्वयं भी ऐसा ही अनुभव है।

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वीर्य-रक्षा के सन्निधमः

पादुका-धारण से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

(१) इससे अण्ड-बुद्धि नहीं होती और जननेन्द्रिय में अनावश्यक उत्तेजना नहीं उठती। (२) मन शान्त और अधिकार में रहता है। (३) बुद्धि और शक्ति की बुद्धि होती है। तथा (४) विषय-शक्ति और दुर्गति घट जाती है।

(२७) सूर्यताप-क्षेचन

'सूर्य आत्मा जगत्तत्संश्रुष्यसि'

(यजुर्वेद)

चराचर प्राणी और समस्त पदार्थों का आत्मा और प्रकाशक होने से परमेश्वर का नाम 'सूर्य' है।

सूर्य भगवान से संसार का कितना बड़ा उपकार होता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं। बड़े बड़े विज्ञान-वेत्ताओं ने यह स्वीकार किया है कि यदि सूर्य न रहे, तो सर्वत्र अन्धकार हो जायगा और सारे मनुष्य, पशु, पक्षी तथा वृक्ष-वृक्षरुद्ध सूर्यो के मारे जीवित न बचेंगे। यह बात वास्तव में ठीक है। वेदों में भी सूर्य की बड़ी प्रशंसा की गई है।

सूर्य का प्रभाव मनुष्य के शरीर पर बहुत गहरा पड़ता है। चिकित्सकों का मत है कि सूर्य की किरणों के सेवन से प्रत्येक प्रकार के रोग शान्त किये जा सकते हैं

वीर्य-रक्षा के लिये भी सूर्य-किरणों बहुत उपयोगी हैं। अधिक से अधिक एक घण्टा मित्य सूर्य-किरणों के सेवन से बड़ा लाभ हो सकता है।

श्रद्धाचर्य-विधान

सब कपड़े खोल कर सूर्य की ओर मुख कर बैठ चाहिये और फिर यह मन में सोचना चाहिये कि सूर्य कं किरणों, जो मेरे शरीर पर पड़ रही हैं, मेरे वीर्य को पुष्ट शुद्ध बना रही हैं। सारे शरीर में नया जीवन भर रहा है। : के घुरे परमाणु नष्ट हो रहे हैं इत्यादि। इस प्रकार कुछ दिन अभ्यास करने से श्रद्धाचर्य के पालन में अच्छी सहायता मिलत सूर्य ताप-सेवन से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

( १ ) सूर्य-ताप सेवन से जीवनी-शक्ति बढ़ती है। ( सर्वाङ्ग के रोग दूर होते हैं। ) ( ३ ) मानसिक शक्तियाँ बढ़ती हैं। साधना की बुद्धि होती है। तथा ( ५ ) कान्ति, तेजस्विता धीरता बढ़ती है।

(२८) सामाजिक शयन

निद्रा तु सेविता काले, धातुसाम्यमतनिन्द्रताम् । पुष्टिं धर्णं बलान्साहं वहिर्दक्षिति करोतिहि ॥

रात में ठीक समय पर सोने से धातु ठीक अवस्था में र है और घुस्ती भी दूर होती है। पुष्टि, कान्ति, बल और वत्साह बढ़ता है तथा अग्नि भी हीम होती है।

दिन भर काम करने के पश्चात् रात में शान्तिपूर्वक से चाहिये। स्वास्थ्य के लिये यह भी एक आवश्यक कार्य है सोने से कई प्रकार के हानिकारक रोग वत्सन्न हो जाते हैं। जैसे अजीर्ण, षडास्तीनता, आलस्य, ववर, स्वप्नदोष, वायुविष

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वीर्य रक्षा के सलियम

वन्माद तथा बुद्धि-भ्रंश इत्यादि । इसलिये प्रत्येक मनुष्य को कम से कम छः घण्टे तक तो अवश्य सोना चाहिये ।

कुछ लोग अधिक रात तक सोते हैं और सूर्य उग जाने के उपरान्त भी सोते रहते हैं । कुछ ऐसे भी हैं जो रात में जागते और दिन में सोते हैं । ऐसे लोग कदापि वीर्य-रक्षा में सफल नहीं हो सकते । सोने का प्रभाव हमारे सब अङ्गों की नस नस पर पड़ता है । समय पर न सो जाने से सब को बड़ी चूति पहुँचती है । रक्त में उष्णता उत्पन्न हो जाने से वीर्य बिगड़ कर किसी न किसी रूप में बाहर निकल जाता है ।

बहुत से विद्यार्थी ऐसे हैं जो अधिक रात तक जाग कर पढ़ते हैं, इससे वे प्रायः अस्वस्थ रहते हैं । स्नानदोष उनके पीछे लग जाता है । कौष्ठ-बद्धता के कारण मल-मूत्र त्यागने में जोर देने से उनका वीर्य बाहर निकल जाता है । ऐसे कई विद्यार्थियों को हमने सामयिक शयन से नीरोग किया है । इसलिये ब्रह्मचर्य रखने वालों को भी हम यही सम्मति देते हैं कि १० बजे रात तक अवश्य सो जाया करे, ताकि प्रातःकाल ४ बजे वे उठ सकें ।

सामयिक शयन से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

(१) सामयिक शयन से सारा श्रम दूर हो जाता है । (२) पुनः कार्य करने की नवीन शक्ति प्राप्त होती है । (३) आयुर्वेद कहता है । (४) स्नानदोष, धातुदोषैक्य, शिरःदोष, आलस्य, अरुणमूत्र और रक्त-विकार आदि से रक्षा होती है । (५) नेत्रों और हृदय को विश्राम मिल जाता है ।

अध्यात्म-विज्ञान

( २६ ) शुभ दर्शन

दर्शन का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध मरित्तक के साथ है। की शक्ति का केन्द्र हमारे मरित्तक में है। इसलिये जो कुछ दे हैं, उसका प्रभाव चिरस्थायी हो जाता है। यह मानस-शास्त्र नियम है।

हमारे हिन्दू-धर्म में दर्शन का बड़ा महत्व माना गया। ऐसा विरला ही कोई हो जो किसी न किसी देवी-देवता के दृष्टि मिलने पर न करता हो। भगवान् के दर्शन करने से पवित्र होता है। दर्शन के समय हमको भगवान् के चरित्र स्मरण कर उनके गुणों का अनुकरण करने की भावना करनी चाहिये और अपने चरित्र के दोषों पर विचार का चाहिये।

इसी प्रकार सबे बैरागी महात्मा, तथा ऋषि लोगों के दर्शन भी लाभ होता है। निरन्तर के अभ्यास से जब एक प्रवृत्ति हृदय में बैठ जायगी तो फिर दूसरी वृत्ति भावना-मूर्ति अपना स्थान न जमा सकेगी।

शुभ दर्शनों से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

( १ ) प्रेम, सदाचार, सौजन्य, भक्ति-भाव और सहिष्णु की वृद्धि होती है। ( २ ) चिन्ता और ग्लानि दूर होती है। ( ३ ) कुकर्मों में चित्त नहीं दीखता। ( ४ ) धर्म में उत्साह बढ़ता है। ( ५ ) हृदय में सदा शुद्ध भावनाएँ जागृत रहती हैं।

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वीर्य-रक्षा के सन्निधम

(२०) दैनिक व्यायाम

शरीरोपचयः कान्तिं गार्गार्णं सुविभक्तता । दीप्तान्तिवधमनालस्यं, स्थिरत्वं लाघवश्रद्धा ॥ श्रमकूलमिपासोऽप्य शीताशीनां सहिष्णुता । आरोग्यशब्दादि परमं, व्यायामादुपजायते ॥

( श्रुतुव-संहिता)

व्यायाम करने से शरीर की कान्ति बढ़ती है, सब अङ्गों का गठन भला मालूम होता है। अग्नि-दीप्तता, निरालस्य, स्थिरता, स्फूर्ति, निरोगिता, परिश्रम, यकावट, सर्दी और गर्मी आदि के सहने की शक्ति और उत्तम आरोग्य प्राप्त होता है।

इस देश में व्यायाम के महत्व से प्रायः लोग परिचित हैं। प्राचीन समय में हिन्दू-जाति इससे बहुत लाभ उठा चुकी है। अभी भी बहुत से लोग किसी न किसी प्रकार के व्यायाम के अभ्यासी देखे जाते हैं। शरीर के लिये व्यायाम अश्वत् रूप है और यही सब कर्मों का साधन है। व्यायाम से ही दुर्बलेन्द्रिय भी वलवान हो जाते हैं।

व्यायाम के श्वाजकल अनेक प्रकार हैं। पर देशी व्यायाम उत्तम है, जैसे डेंडू, वैठक, दौड़ और मिह्न्त आदि। व्यायाम वीर्य-रक्षा का भी परमोत्तम साधन है। जो वीर्य-रक्षक नहीं है, वह कभी व्यायाम में सफल नहीं हो सकता। लड़ने-मिह्ने वाले लोग अपने वीर्य पर संयम रखते हैं। नियम-पूर्वक एक वर्षतक किसी प्रकार का व्यायाम करते रहने से शरीर सुदृढ़ और सुन्दर

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मूलचर्य-विधान

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वन जाता है। मूलचर्य का पालन करनेवाले के लिये व्याप बड़ा ही उपयोगी होता है।

व्यायाम दो बार किया जा सकता है। यदि न हो सके, एक बार सबेरे तो अवश्य ही करना चाहिये। व्यायाम के पश्च योड़ी देर ठहर कर कुछ जलपान कर लेना चाहिये।

(१) दैनिक व्यायाम से मन शान्त और सदा प्रसन्न रह है। (२) कठिन से कठिन कार्य सरल प्राप्त होते हैं। (३) इन्द्र के दमन की शक्ति मिलती है। (४) विषय-भोगों में निर्लिप्त होती है। तथा (५) अनेक शारीरिक और मानसिक दुःख दूर होते हैं।

(३१) आसनों का अभ्यास

योग-शास्त्र में आसन भी योग का एक अङ्ग माना गया है इसे एक प्रकार का व्यायाम भी कह सकते हैं। शरीर के लिये यह अत्यन्त उपयोगी है ही, पर इससे मानसिक लाभ भी बढ़ होता है। जब तक आसन स्थिर नहीं होता, मन की चञ्चलता जा नहीं। अनस्थिरता के कारण भी मन में विषय-वासनायें जाग ही उठती हैं। कुछ आसन ऐसे हैं, जिनसे वीर्य-रक्षा तथा इन्द्र दमन में बड़ी सहायता मिलती है। यही कारण है कि योगी-लं आसन के प्रायः अभ्यासी होते हैं।

सीधे बैठना, सीधे चलना आदि भी आसनों के अङ्ग हैं, आजकल हम देखते हैं प्रायः लोग इस ओर ध्यान ही नहीं देते इससे उनको स्नायविक व्यास-प्रत्यास-क्रिया ( जो शरीर

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जीर्ण-न्दा के सन्निधम

नीरोग रखने के लिये घड़ी आवश्यक है ) वचित रूप से नहीं होती । इससे जीवन्ती-शक्ति घटती और रोग बढ़ता है ।

हमारे विचार से आसनों में 'सिद्धान्त' सब साधारण के लिये न्यत्यन्त उपयोगी है । इससे किसी प्रकार की किसी को हानि नहीं हो सकती । यह सरल भी है । इसकी अपेक्षा दूसरे आसन क्रिष्टसाध्य तथा देश, काल और वल का विचार रख कर किये जा सकते हैं । उनमें जरा भी त्रुटि होने से शारीरिक तथा मानसिक हानि होने की भी सम्भावना है ।

इस आसन को करते समय समश्रुंभ पर बैठना चाहिये । खाली पेट रहना उपयोगी है । स्नान के पश्चात् प्रातःकाल इसकी साधना अच्छी होती है । इस आसन से चपटे भर तक चाहे बैठ सकते हैं, कोई त्राति की सम्भावना नहीं ।

बाँये पैर की पड़ी गुदा और इन्द्री के बीच में और दाये पैर की एड़ बाँये पैर पर लिङ्गोन्द्रिय के ऊपर रखनी चाहिये । सिर को सीधे, उड़ी-को मुका कर तथा आँखों को सामने करके कमर बिना मुकाये सीधे बैठ जाओ । शुरु शुरु में इसका अभ्यास करने में कुछ कठिनाई मात्स्य होगी । पर थोड़े दिनों के अभ्यास से ही यह साधा जा सकता है । जब कभी काम-विकार हृदय में पैदा हो, उसी समय यह आसन लगा कर बैठ जाना चाहिये और हृदय में परमात्मा का ध्यान कर अपने काम-विकार को धिक्कारना चाहिये । फिर देखिये आप के चित्त पर कैसा उत्तम प्रभाव होता है ।

प्रहसचर्य-विधान

( ३२ ) श्रीपौसन

सिर के बल पर जो आसन साधा जाय, उसे 'श्रीपौसन' व है। वास्तव में यह आसन सव आसनों में राजा के समान यह आसन योगियों के लिये विरोध रूप से उपयोगी है। सं गृहस्थ भी इसे कर सकते हैं, पर एक बात अवश्य है कि आसन के करने में असावधानी हो जाने से हानि भी हो स है। इस आसन की साधना में खान-पान तथा नियम पालन आवश्यकता होती है। बहुत निर्बलता और रोग की अवस्थ यह आसन न करना चाहिये।

इस आसन के करने में सारे शरीर का रक्त दौड़कर मरि में एकत्र होता है और समस्त रक्त-वाहिनी नाड़ियों को करना पड़ता है। अभ्यास बढ़ जाने पर नित्य अधिक से आँ चौथाई घण्टा तक करना हितकर होता है।

किसी भाँत के पास कपड़े की छोटी गद्दी बिछा कर अ सिर को उस पर नीचे रख कर और दोनों हथेली को सिंग मिलाकर, दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर को उस भाँत पर रख चाहिये। फिर दोनों पैरों को सटाकर ऊपर की ओर सिर बिल कुल सीध में जितने समय तक ठहर सकें, ठहरना चाहि कई दिनों में इसका अभ्यास हो जाने पर बिना भाँत के स भी किया जा सकता है।

आसनों का अभ्यास कर लेने पर थोड़ी देर तक आराम लेना चाहिये। उत्तम तो यह हो कि किसी आसन जानने के पास कुछ दिन रह कर अभ्यास कर लेना चाहिये।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम

शीर्षसन से नीचे लिम्बे लाभ होते हैं :—

( १ ) शीर्षसन के करने से दूषित रक्त भी शुद्ध हो जाता है। ( २ ) मेषा-शक्ति बढ़ती है। ( ३ ) रोगों से मुक्ति मिलती है। ( ४ ) स्वास्थ्य में अपूर्व परिर्वर्त्तन दिखाई पड़ता है। एवं ( ५ ) वीर्य को शान्ति और पुष्टता प्राप्त होती है।

(३३) आडम्बर-शून्यता

आजकल पाश्चात्य सभ्यता की हवा लग जाने के कारण समाज में आडम्बर का प्रवेश हो गया है। हमारे विचारार्थीगण जिनका जीवन सादा होना चाहिये, वे भी इसके फेर में फँस गये हैं। आडम्बर करने से मनुष्य की मान-प्रतिष्ठा बढ़ जाती है, यह बात मान लेना भारी भ्रम है। सरलता और सादगी से रहना और उच्च विचार करने से ही मनुष्य संसार में सभ्य और श्रेष्ठ बन सकता है।

हमने आडम्बरों पुरुषों और स्त्रियों में प्रायः अविवेक अधिक देखा है। आडम्बर स्वयं व्यभिचार की ओर हृदय खींच ले जाता है। आडम्बर त्रिकारों का मूल है।

व्यर्थ की वस्तुएँ लेकर शरीर की सजाना और अज्ञ-प्रत्यक्ष को वेदव रखना ही आडम्बर है। ऐसे कार्य करने वाले मूर्ख, दुराचारी और अविवेकी होते हैं। इसलिये जो लोग ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हों, वे अवश्य अपने को नाना प्रकार के दिखावटी आडम्बरों से दूर रखें। इसी में उनकी वास्तविक कल्याण है।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

इस देश के प्राचीन निवासी प्रायः आहम्बर से घृणा कते थे। उन्होंने कभी अपने को उसका गुलाम नहीं बनाया। कारण था कि वे लोग बुद्धिमान, वीर और ऐश्वर्यवान होते। उनका समय और परिश्रम व्यर्थ आहम्बर में नहीं लपाता था।

(३४) मातृ-भाव

मातृवत् परदारेणु, परद्रव्येषु लोघ्वत्।

आत्मवत्सत्वं भूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥

( सृष्टि

जो पराई खी को माता के सहस्र, पराये धन को ढेले समान और दूसरे को अपने तुल्य समझे, वह विद्वान् है।

सब के उपकारों का कुछ बदला दिया जा सकता है, पर पू माता के उपकारों का नहीं। मातृ-भाव की महान्ता शब्दों में नहीं ब साई जा सकती है। माता के प्रति किसी भी कुभावना नहीं होती। य संसार की क्षियों को माता मान लें, तो फिर हृदय में काम कुछ विकार उठ नहीं सकता। इसलिये ब्रह्मचर्य के प्रेमी को मा भाव को मन, वच तथा कर्म से धपाना चाहिये। अपनी अब से बड़ी जितनी स्त्रियाँ हैं, उन्हें माता जानना उन्हें आदर-सुख शब्दों से सम्बोधित करना और उनका भय मन में रखना चाहिये। वीर्य-रक्षा का यह सर्वोत्कृष्ट उपाय है।

श्रीराम ने वीर लक्ष्मण को सीताजी के गहने दिखाए

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चौर्य-रक्षा के सविनयम

पूछा कि तुम इन्हें पहचानते हो कि ये किस के हैं ? इस पर चढ़ोने क्या कहा:—

नाहं जानामि कैयूरे, नाहं जानामि कुण्डले ।

नृपुरे त्वमिजानामि, त्वि्य पाशमि वन्दनात् ॥

( कल्मीकि रामायण )

न तो मैं कंकणों को जानता हूँ और न कुण्डलों को ही। पर हूँ, मैं दोनों पाजेव को पहचानता हूँ। क्योंकि मैं त्वि्य जानकी जी के पैरों पर मुक्त कर प्रणाम करता था।

धन्य हो लक्ष्मण, धन्य ! इसी का नाम मातृ-भाव है ! इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा क्यों न की जा सके ?

परमईश्वर रामकृष्ण तो सारे संसार को ही मातृमय मान कर उपासना करते थे। इस प्रकार चढ़ोने अपना सारा जीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य में वितताया।

एक साध्वी स्त्री स्वामी दयानन्द जी के पास आई, और कहा कि भगवन्, मैं आजाल ब्रह्मचारिणी हूँ, और आप भी एक आदर्श ब्रह्मचारी हैं। यदि आप मुक्त से विवाह कर लें, तो मेरे गर्भ से आप जैसा ही दिग्विजयी विद्वान और लोकोंपकारी पुत्र उत्पन्न होगा। इस पर स्वामीजी ने कहा 'हे माता तुम मुझे ही क्यों नहीं अपना पुत्र मान लेतीं ? यह उत्तर पाकर वह लज्जित हो गई।

( ३५ ) भगिनी-भाव

भगिनी-भाव में भी बड़ी पवित्रता है। उसकी भावना से हृदय की दुर्बोसना तत्क्षय शान्त हो जाती है।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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माता की पुत्री को भगिनी कहते हैं। यह भी माता के पक्ष आदरणीया समझी जाती है। इसके प्रति भी हृदय में दुःख नही होती। ब्रह्मचर्य-पाठन में भगिनी-भाव से भी अच्छी सत् यत्ता मिलती है। जो रित्रियाँ समान वय वाली हों, उन्हें भगिन रूप समझना चाहिये।

एक समय की बात है कि छत्रपति शिवाजी ने एक युव को किसी सुसलमान के हाथ से बेचाया। इस पर उसने कहा कि अब मैं आप की हो चुकी। किन्तु शिवाजी ने कहा कि मैं यह कोई उपकार का काम नहीं किया। यह तो मेरा कर्तव्य था। तुम मेरी आज से धर्म-भगिनी हुई। इस पर उस को उन्हें शतशः धन्यवाद दिये।

एक पौराणिक कथा है कि देवयानी नाम की एक परम सुन्दर कन्य नामक विद्यार्थी पर मोहित हो गई थी। वह कन्य को हृद से प्यार करती थी। उसने एक दिन कन्य से वैवाहिक प्रेम चाहा। इस पर उसने कहा कि तुम मेरे गुप्त की पुत्री होने के कारण धर्म-भगिनी हो ! प्राण रहते, मैं कदापि तुम्हें नहीं बर सकता। इस प्रकार कन्य की रक्षा हुई। अतएव समान वय वाली स्त्रियों के प्रति भगिनी-भाव रखना चाहिये।

(३६) पुत्री-भाव

पुत्री की उत्पत्ति अपने ही शरीर से होती है। उसके प्रति सदैव मनुष्य का पवित्र स्नेह होता है। उसका उपकार आजीवन लोग करते रहते हैं। इसलिये ब्रह्मचर्य-रक्षा में पुत्री-भाव भी

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जीव-रक्षा के सञ्चियम

यहुत सहायक होता है। जो खियों अपनी आयु से छोटी हैं, वे पुत्री ही हैं। उनको पुत्री वाले शब्दों से ही पुकारना चाहिये।

कई पुरतकों में यह बात पही गई है कि इस प्रकार कई खियों ने अपने सतील की रक्षा की है। शत्रुओं या दुराचारियों के अधिकार में आते ही, उन्होंने कहा कि मैं आपकी धर्म-पुत्री हूँ, जो चाहें सो करें। इस पर उन लोगों के हृदय झिल गये, और अत्याचार के लिये हाथ न उठ सके, बल्कि उन लोगों ने उन खियों को पुत्री की भाँति, उनके घर पहुँचा दिया। अतएव अपने से छोटी आयु वाली खियों के प्रति पुत्री-भाव रखना बहुत ही श्रेयस्कर है।

(३७) भाव की निर्मलता

सुचिकानां सहस्रैस्तुदकुलुम्ब शतान्यपि। न श्रुद्ध्यन्ति दुरात्मानां, येषां भावो न निर्मलः।

( दश-स्वप्नि )

जिन लोगों का भाव निर्मल ( शुद्ध ) नहीं, वे दुरात्मा हज़ारों मन भिड़ी और सैकड़ों घड़े जल से भी शुद्ध नहीं किये जा सकते।

“भावेहि विद्यते देवस्तस्माद्भावेहि कारणम् ।”

भाव में ही देवता बसते हैं, अतः भाव ही प्रधान है।

भाव ही सब कुछ है। इसी भाव के प्रभाव से लोग ईश्वर तक को प्राप्त कर लेते हैं। पर वह भाव होना चाहिये सच्चा; जिस पुरुष का भाव निर्मल है, उसे संसार ही निर्मल दिखाई पड़ता

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

है, और जिसका पापमय है, उसे सब कुछ दूषित ही ज्ञात है। क्योंकि कहा गया है:—

जाको रद्दी भावना जसी ।

प्रभु मूर्ति देखी तिन तैसी ॥

(४० रामायण)

इसलिये भाव की निर्मलता पर विशेष ध्यान देना चाहिये ब्रह्मचर्य के लिये वह नितान्त आवश्यक है। इस भाव से संस की सभी खियाँ ब्रह्मचारिणी दिखलाई पड़ेंगी और समस्त पुसदाचारी ज्ञात होंगे। फिर तो व्यभिचार के लिये कोई कारण ही न मिल सकेगा। जिसके भाव में निर्मलता है, वह औरों हृदय को भी बदल सकता है। जैसे, चन्दन जिस वन में रह है, अपनी सुगन्धि से और वृक्षों को भी सुगन्धित कर देता है अतएव सदा अपने हृदय में शुद्ध भावों को स्थान देना चाहिये और तुरे विचारों के आते ही भगवद्भजन या महात्माओं उपदेशों का स्मरण करना चाहिये।

( ३८ ) ज्ञानेन्द्रियों पर संयम

‘वृत्तीन्द्रियाणां पञ्चैव; शब्दाद्या विषया मताः।’

ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं, और शब्दादि इनके पाँच विषय माने गये हैं।

ये इन्द्रियाँ, जिनके द्वारा अन्तरात्मा को पदार्थों का ज्ञान होता है, ज्ञानेन्द्रियाँ कहलाती हैं। ये पाँच हैं। कान, त्वचा, नेत्र जीभ और नाक। शब्द, रूप, रूप, रस और गन्ध, ये पाँच क्रम से उनके विषय हैं।

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वीर्य रक्षा के सल्लिख्य

श्री भगवद्गीता में लिखा है कि यदि समस्त इन्द्रियों में किसी एक इन्द्रिय का भी द्वार खुला रह जाय, तो मनुष्य की सुदृष्टि इस प्रकार नष्ट होने लगती है जिस प्रकार कि मशक (पानी का थैला) में एक छिद्र हो जाने से सारा पानी उस में का बह जाता है।

वीर्य-नाश से बचने के लिये ज्ञानेन्द्रियों पर अधिकार जमा लेना अत्यन्त उपयोगी है। वे लोग कभी जहाजचर्च का पालन नहीं कर सकते, जिनकी ज्ञानेन्द्रियाँ अपने अपने विषयों में स्वतन्त्र हो कर विचरण करती हैं।

अब हम इनके संयम के लिये कुछ उपाय बतलाते हैं:—

शब्द का महग्न कान से होता है। जैसे शब्द कान में पड़ते हैं, वैसा ही हृदय पर प्रभाव होता है। इसलिये कानों से किसी प्रकार के अश्लील शब्द न सुनने चाहियें। न्यभिचार की कथा, दूषित भाव उत्पन्न करने वाली बात और आत्मोत्साह को हीन करने वाली युक्तियों के सुनते सुनते यह इन्द्रिय वश के बाहर हो जाती है। इसे वश में करने के लिये सदुपदेश और वेद-मन्त्रों के घोष को सुनना चाहिये।

स्पर्श का अनुभव त्वचा से होता है। जैसी वस्तु त्वचा से छूई जाती है, वैसी ही रुचि उत्पन्न होती है। इसलिये इससे कोई ऐसी वस्तु न छूनी चाहिये, जिससे काम-वासना को सहायता मिले। जैसे, कोमल शय्या पर शयन करना, तरुणों की का कर-स्पर्श करना और शरीर पर सुन्दर-सुखद वस्त्र धारण करना। इन कार्यों से यह इन्द्रिय वशवर्तिनी नहीं रह सकती। अब: इस के विपरीत कार्य करने में ही हित है।

ऋक्षचर्य-विधान

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रूप का ज्ञान आँखों से होता है । यह इन्द्रिय भी बड़ी बचती है । चार-चार युवती की पर दृष्टिपात करने, अस्लील नात देखने, नम्र स्त्रियों के चित्रों को निहारने और पशु-पक्षियों की क्रीविलोकने से यह इन्द्रिय स्वतन्त्र हो जाती है । इसलिये अपने वश में करने के लिये ईश्वरीय सृष्टि, प्राकृतिक सुन्दर और दिव्य मूर्तियों के देखने का अभ्यास करना चाहिये ।

रसका आनन्द जीभ से लिया जाता है । यह सर्वत्र सपदार्थों पर दौड़ती है । अधिक मीठे, अधिक तीते, अधिक ख़ाथिक चिकने और अधिक कड़वे पदार्थों के सेवन से यह विग जाती है । इसे वश में करने के लिये यह उपाय है कि यह चाहे, उसे देवे ही नहीं । मिठाईयों का रस लेना चाहे, तो इस चने चबवाना चाहिये । इस प्रकार इसकी लोलुपता कम जायगी । इसे बही और छतना ही पदार्थ सेवन के लिये दे चाहिये, जितने से स्वास्थ्य और ऋक्षचर्य बना रहे ।

गन्ध का अनुभव नाक से होता है । इसे दुर्गन्धित वस्तुओं के सँघने से बचाना चाहिये । कामोत्पादक सुगन्धित पदार्थों से इसे न देना ही ठीक है । इससे स्वास्थ्यप्रद वायु और दूर फूलों की सुगन्धि ही लेनी चाहिये । इसे भी सर्वत्र वश में रख आवश्यक है ।

ज्ञानेन्द्रियों के संयम से मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर सपर अधिकार प्राप्त होता है । और सत्कर्त्तव्यों का पालन हो सकता है । तथा योग की सिद्धि भी हा सकती है ।