ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंऋग्वेद-विज्ञान
( २६ ) खड़ाऊ पहनना
वीर्य-रत्ना के लिये खड़ाऊ पहनना बड़ा श्रेयस्कर सिद्ध है। यही कारण है कि ऋग्वेद की दीक्षा के समय बालक पाहुका ( खड़ाऊ) पहना दो जाती है। बहुत से सन्थासिय भी हमने सदा खड़ाऊ पहनते हुये देखा है। खड़ाऊ काठ की होती है। इसकी पवित्रता में तो कोई सन्देह ही नहीं। पिंदिन-रात में आवश्यकता पड़ने पर जल से धोई भी जा सकता है। ये दोनों पैरों में पहनी जाती हैं और इनकी दोनों हैं दोनों अंगुठों की मोटी नसों को दबाती हैं। इन नसों और जननेन्द्रिय का बड़ा भारी सम्बन्ध है। इनकी दाब से इंद्रिय में व्यर्थ और असमय में उठने वाली उत्तेजना दबती है। इनका प्रभाव मस्तिष्क तक पड़ता है। इसलिये काम-ग्री भी वाधा नहीं पहुँचाने पाते। पाहुका के गुणों को इसके अर्थ स्वयं जान सकते हैं।
नित्य की पहनने वाली पाहुकायें पुष्ट लकड़ी की घनी हलकी होती चाहिये। उनकी खूंटियाँ गोल, बड़ी और नीचे ढ़िदार रहें। इसके विरुद्ध रहने से आँखों को हानि पहुँचती है जूते की अपेक्षा खड़ाऊ के पहनने में विशेष सरलता सुविधा होती है। खर्च भी कम पड़ता है। धर्म की रत्ना है। जूते पहननेवालों के पैरों में बड़ी वद्वृद्धि होती है और इसलिये नाना प्रकार के रोग उससे शरीर में पैदा हो जाते ऋग्वेद-पालन करने वालों के लिये पाहुका-धारण बहुत होला है। इस सम्बन्ध में हमारा स्वयं भी ऐसा ही अनुभव है।