भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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वीर्य-रत्ना के सजियम

॥(२) हृदय में स्वाभाविक शान्ति रहती है। (३) मनुष्य धरत्ता से कार्यों में लगा रहता है। (४) उद्योग में कमी नहीं होती। एवं (५) सद्चित्तों की उत्पत्ति होती है।

(२५) विश्व-प्रेम

‘उदार चरितानांतु, वसुधैव कुटुम्बकम् ।’

जो उदार चरित्र वाले पुरुष हैं, वे संसार को अपना कुटुम्बी मानते हैं।

विश्व-प्रेम बड़ी है, जिसमें कि अपने-परारेषण का भेद-भाव नहीं रह जाता। ऐसे प्रेमी का हृदय शुद्ध और सरल हो जाता है। उसके विचार श्रेष्ठ और पवित्र हो जाते हैं। इसी से वह संसार के स्त्री-पुरुषों को अपना कुटुम्बी समझता है। ऐसा कदाचित् ही कोई नीच मनुष्य हो, जो अपने कुटुम्बियों के प्रति दुर्भाव रखता हो और उनका अहित चाहता हो ! विश्व-प्रेमी के हृदय में अन्य किसी स्त्री पर कुछि फेरने का विकार ही नहीं उठ सकता। वह तो अधम और अन्यायियों को भी सदाचारी और चरित्रवान् तथा कुलदा और दयभिवारिणी को साध्वी और सदाचारिणी बनाने का प्रयत्न करता रहता है। वह सुख और शान्ति के लिये वायु-मण्डल को ही प्रक्षपयैमय देखना चाहता है। उसके विश्व-प्रेम का यह अन्तिम ध्येय होता है। फिर ऐसा पुरुष वीर्य-रत्ना में अपने को निश्चाय रूप से समर्थ बना सकता है।

अतएव ऐसी उद्वभावना सदा मन में रखनी चाहिये।