भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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वीर्य-रक्षा के सन्निधमः

पादुका-धारण से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

(१) इससे अण्ड-बुद्धि नहीं होती और जननेन्द्रिय में अनावश्यक उत्तेजना नहीं उठती। (२) मन शान्त और अधिकार में रहता है। (३) बुद्धि और शक्ति की बुद्धि होती है। तथा (४) विषय-शक्ति और दुर्गति घट जाती है।

(२७) सूर्यताप-क्षेचन

'सूर्य आत्मा जगत्तत्संश्रुष्यसि'

(यजुर्वेद)

चराचर प्राणी और समस्त पदार्थों का आत्मा और प्रकाशक होने से परमेश्वर का नाम 'सूर्य' है।

सूर्य भगवान से संसार का कितना बड़ा उपकार होता है, यह कहने की आवश्यकता नहीं। बड़े बड़े विज्ञान-वेत्ताओं ने यह स्वीकार किया है कि यदि सूर्य न रहे, तो सर्वत्र अन्धकार हो जायगा और सारे मनुष्य, पशु, पक्षी तथा वृक्ष-वृक्षरुद्ध सूर्यो के मारे जीवित न बचेंगे। यह बात वास्तव में ठीक है। वेदों में भी सूर्य की बड़ी प्रशंसा की गई है।

सूर्य का प्रभाव मनुष्य के शरीर पर बहुत गहरा पड़ता है। चिकित्सकों का मत है कि सूर्य की किरणों के सेवन से प्रत्येक प्रकार के रोग शान्त किये जा सकते हैं

वीर्य-रक्षा के लिये भी सूर्य-किरणों बहुत उपयोगी हैं। अधिक से अधिक एक घण्टा मित्य सूर्य-किरणों के सेवन से बड़ा लाभ हो सकता है।