भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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श्रद्धाचर्य-विधान

सब कपड़े खोल कर सूर्य की ओर मुख कर बैठ चाहिये और फिर यह मन में सोचना चाहिये कि सूर्य कं किरणों, जो मेरे शरीर पर पड़ रही हैं, मेरे वीर्य को पुष्ट शुद्ध बना रही हैं। सारे शरीर में नया जीवन भर रहा है। : के घुरे परमाणु नष्ट हो रहे हैं इत्यादि। इस प्रकार कुछ दिन अभ्यास करने से श्रद्धाचर्य के पालन में अच्छी सहायता मिलत सूर्य ताप-सेवन से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

( १ ) सूर्य-ताप सेवन से जीवनी-शक्ति बढ़ती है। ( सर्वाङ्ग के रोग दूर होते हैं। ) ( ३ ) मानसिक शक्तियाँ बढ़ती हैं। साधना की बुद्धि होती है। तथा ( ५ ) कान्ति, तेजस्विता धीरता बढ़ती है।

(२८) सामाजिक शयन

निद्रा तु सेविता काले, धातुसाम्यमतनिन्द्रताम् । पुष्टिं धर्णं बलान्साहं वहिर्दक्षिति करोतिहि ॥

रात में ठीक समय पर सोने से धातु ठीक अवस्था में र है और घुस्ती भी दूर होती है। पुष्टि, कान्ति, बल और वत्साह बढ़ता है तथा अग्नि भी हीम होती है।

दिन भर काम करने के पश्चात् रात में शान्तिपूर्वक से चाहिये। स्वास्थ्य के लिये यह भी एक आवश्यक कार्य है सोने से कई प्रकार के हानिकारक रोग वत्सन्न हो जाते हैं। जैसे अजीर्ण, षडास्तीनता, आलस्य, ववर, स्वप्नदोष, वायुविष