भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

इस देश के प्राचीन निवासी प्रायः आहम्बर से घृणा कते थे। उन्होंने कभी अपने को उसका गुलाम नहीं बनाया। कारण था कि वे लोग बुद्धिमान, वीर और ऐश्वर्यवान होते। उनका समय और परिश्रम व्यर्थ आहम्बर में नहीं लपाता था।

(३४) मातृ-भाव

मातृवत् परदारेणु, परद्रव्येषु लोघ्वत्।

आत्मवत्सत्वं भूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥

( सृष्टि

जो पराई खी को माता के सहस्र, पराये धन को ढेले समान और दूसरे को अपने तुल्य समझे, वह विद्वान् है।

सब के उपकारों का कुछ बदला दिया जा सकता है, पर पू माता के उपकारों का नहीं। मातृ-भाव की महान्ता शब्दों में नहीं ब साई जा सकती है। माता के प्रति किसी भी कुभावना नहीं होती। य संसार की क्षियों को माता मान लें, तो फिर हृदय में काम कुछ विकार उठ नहीं सकता। इसलिये ब्रह्मचर्य के प्रेमी को मा भाव को मन, वच तथा कर्म से धपाना चाहिये। अपनी अब से बड़ी जितनी स्त्रियाँ हैं, उन्हें माता जानना उन्हें आदर-सुख शब्दों से सम्बोधित करना और उनका भय मन में रखना चाहिये। वीर्य-रक्षा का यह सर्वोत्कृष्ट उपाय है।

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