भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 380 में से

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चौर्य-रक्षा के सविनयम

पूछा कि तुम इन्हें पहचानते हो कि ये किस के हैं ? इस पर चढ़ोने क्या कहा:—

नाहं जानामि कैयूरे, नाहं जानामि कुण्डले ।

नृपुरे त्वमिजानामि, त्वि्य पाशमि वन्दनात् ॥

( कल्मीकि रामायण )

न तो मैं कंकणों को जानता हूँ और न कुण्डलों को ही। पर हूँ, मैं दोनों पाजेव को पहचानता हूँ। क्योंकि मैं त्वि्य जानकी जी के पैरों पर मुक्त कर प्रणाम करता था।

धन्य हो लक्ष्मण, धन्य ! इसी का नाम मातृ-भाव है ! इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा क्यों न की जा सके ?

परमईश्वर रामकृष्ण तो सारे संसार को ही मातृमय मान कर उपासना करते थे। इस प्रकार चढ़ोने अपना सारा जीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य में वितताया।

एक साध्वी स्त्री स्वामी दयानन्द जी के पास आई, और कहा कि भगवन्, मैं आजाल ब्रह्मचारिणी हूँ, और आप भी एक आदर्श ब्रह्मचारी हैं। यदि आप मुक्त से विवाह कर लें, तो मेरे गर्भ से आप जैसा ही दिग्विजयी विद्वान और लोकोंपकारी पुत्र उत्पन्न होगा। इस पर स्वामीजी ने कहा 'हे माता तुम मुझे ही क्यों नहीं अपना पुत्र मान लेतीं ? यह उत्तर पाकर वह लज्जित हो गई।

( ३५ ) भगिनी-भाव

भगिनी-भाव में भी बड़ी पवित्रता है। उसकी भावना से हृदय की दुर्बोसना तत्क्षय शान्त हो जाती है।

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