भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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माता की पुत्री को भगिनी कहते हैं। यह भी माता के पक्ष आदरणीया समझी जाती है। इसके प्रति भी हृदय में दुःख नही होती। ब्रह्मचर्य-पाठन में भगिनी-भाव से भी अच्छी सत् यत्ता मिलती है। जो रित्रियाँ समान वय वाली हों, उन्हें भगिन रूप समझना चाहिये।

एक समय की बात है कि छत्रपति शिवाजी ने एक युव को किसी सुसलमान के हाथ से बेचाया। इस पर उसने कहा कि अब मैं आप की हो चुकी। किन्तु शिवाजी ने कहा कि मैं यह कोई उपकार का काम नहीं किया। यह तो मेरा कर्तव्य था। तुम मेरी आज से धर्म-भगिनी हुई। इस पर उस को उन्हें शतशः धन्यवाद दिये।

एक पौराणिक कथा है कि देवयानी नाम की एक परम सुन्दर कन्य नामक विद्यार्थी पर मोहित हो गई थी। वह कन्य को हृद से प्यार करती थी। उसने एक दिन कन्य से वैवाहिक प्रेम चाहा। इस पर उसने कहा कि तुम मेरे गुप्त की पुत्री होने के कारण धर्म-भगिनी हो ! प्राण रहते, मैं कदापि तुम्हें नहीं बर सकता। इस प्रकार कन्य की रक्षा हुई। अतएव समान वय वाली स्त्रियों के प्रति भगिनी-भाव रखना चाहिये।

(३६) पुत्री-भाव

पुत्री की उत्पत्ति अपने ही शरीर से होती है। उसके प्रति सदैव मनुष्य का पवित्र स्नेह होता है। उसका उपकार आजीवन लोग करते रहते हैं। इसलिये ब्रह्मचर्य-रक्षा में पुत्री-भाव भी