ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 348, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ें३४५
वीर्य-रक्षा के सन्निधम
(२०) दैनिक व्यायाम
शरीरोपचयः कान्तिं गार्गार्णं सुविभक्तता । दीप्तान्तिवधमनालस्यं, स्थिरत्वं लाघवश्रद्धा ॥ श्रमकूलमिपासोऽप्य शीताशीनां सहिष्णुता । आरोग्यशब्दादि परमं, व्यायामादुपजायते ॥
( श्रुतुव-संहिता)
व्यायाम करने से शरीर की कान्ति बढ़ती है, सब अङ्गों का गठन भला मालूम होता है। अग्नि-दीप्तता, निरालस्य, स्थिरता, स्फूर्ति, निरोगिता, परिश्रम, यकावट, सर्दी और गर्मी आदि के सहने की शक्ति और उत्तम आरोग्य प्राप्त होता है।
इस देश में व्यायाम के महत्व से प्रायः लोग परिचित हैं। प्राचीन समय में हिन्दू-जाति इससे बहुत लाभ उठा चुकी है। अभी भी बहुत से लोग किसी न किसी प्रकार के व्यायाम के अभ्यासी देखे जाते हैं। शरीर के लिये व्यायाम अश्वत् रूप है और यही सब कर्मों का साधन है। व्यायाम से ही दुर्बलेन्द्रिय भी वलवान हो जाते हैं।
व्यायाम के श्वाजकल अनेक प्रकार हैं। पर देशी व्यायाम उत्तम है, जैसे डेंडू, वैठक, दौड़ और मिह्न्त आदि। व्यायाम वीर्य-रक्षा का भी परमोत्तम साधन है। जो वीर्य-रक्षक नहीं है, वह कभी व्यायाम में सफल नहीं हो सकता। लड़ने-मिह्ने वाले लोग अपने वीर्य पर संयम रखते हैं। नियम-पूर्वक एक वर्षतक किसी प्रकार का व्यायाम करते रहने से शरीर सुदृढ़ और सुन्दर
२१