भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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अध्यात्म-विज्ञान

( २६ ) शुभ दर्शन

दर्शन का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध मरित्तक के साथ है। की शक्ति का केन्द्र हमारे मरित्तक में है। इसलिये जो कुछ दे हैं, उसका प्रभाव चिरस्थायी हो जाता है। यह मानस-शास्त्र नियम है।

हमारे हिन्दू-धर्म में दर्शन का बड़ा महत्व माना गया। ऐसा विरला ही कोई हो जो किसी न किसी देवी-देवता के दृष्टि मिलने पर न करता हो। भगवान् के दर्शन करने से पवित्र होता है। दर्शन के समय हमको भगवान् के चरित्र स्मरण कर उनके गुणों का अनुकरण करने की भावना करनी चाहिये और अपने चरित्र के दोषों पर विचार का चाहिये।

इसी प्रकार सबे बैरागी महात्मा, तथा ऋषि लोगों के दर्शन भी लाभ होता है। निरन्तर के अभ्यास से जब एक प्रवृत्ति हृदय में बैठ जायगी तो फिर दूसरी वृत्ति भावना-मूर्ति अपना स्थान न जमा सकेगी।

शुभ दर्शनों से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

( १ ) प्रेम, सदाचार, सौजन्य, भक्ति-भाव और सहिष्णु की वृद्धि होती है। ( २ ) चिन्ता और ग्लानि दूर होती है। ( ३ ) कुकर्मों में चित्त नहीं दीखता। ( ४ ) धर्म में उत्साह बढ़ता है। ( ५ ) हृदय में सदा शुद्ध भावनाएँ जागृत रहती हैं।