भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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मूलचर्य-विधान

३१

वन जाता है। मूलचर्य का पालन करनेवाले के लिये व्याप बड़ा ही उपयोगी होता है।

व्यायाम दो बार किया जा सकता है। यदि न हो सके, एक बार सबेरे तो अवश्य ही करना चाहिये। व्यायाम के पश्च योड़ी देर ठहर कर कुछ जलपान कर लेना चाहिये।

(१) दैनिक व्यायाम से मन शान्त और सदा प्रसन्न रह है। (२) कठिन से कठिन कार्य सरल प्राप्त होते हैं। (३) इन्द्र के दमन की शक्ति मिलती है। (४) विषय-भोगों में निर्लिप्त होती है। तथा (५) अनेक शारीरिक और मानसिक दुःख दूर होते हैं।

(३१) आसनों का अभ्यास

योग-शास्त्र में आसन भी योग का एक अङ्ग माना गया है इसे एक प्रकार का व्यायाम भी कह सकते हैं। शरीर के लिये यह अत्यन्त उपयोगी है ही, पर इससे मानसिक लाभ भी बढ़ होता है। जब तक आसन स्थिर नहीं होता, मन की चञ्चलता जा नहीं। अनस्थिरता के कारण भी मन में विषय-वासनायें जाग ही उठती हैं। कुछ आसन ऐसे हैं, जिनसे वीर्य-रक्षा तथा इन्द्र दमन में बड़ी सहायता मिलती है। यही कारण है कि योगी-लं आसन के प्रायः अभ्यासी होते हैं।

सीधे बैठना, सीधे चलना आदि भी आसनों के अङ्ग हैं, आजकल हम देखते हैं प्रायः लोग इस ओर ध्यान ही नहीं देते इससे उनको स्नायविक व्यास-प्रत्यास-क्रिया ( जो शरीर