भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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जीर्ण-न्दा के सन्निधम

नीरोग रखने के लिये घड़ी आवश्यक है ) वचित रूप से नहीं होती । इससे जीवन्ती-शक्ति घटती और रोग बढ़ता है ।

हमारे विचार से आसनों में 'सिद्धान्त' सब साधारण के लिये न्यत्यन्त उपयोगी है । इससे किसी प्रकार की किसी को हानि नहीं हो सकती । यह सरल भी है । इसकी अपेक्षा दूसरे आसन क्रिष्टसाध्य तथा देश, काल और वल का विचार रख कर किये जा सकते हैं । उनमें जरा भी त्रुटि होने से शारीरिक तथा मानसिक हानि होने की भी सम्भावना है ।

इस आसन को करते समय समश्रुंभ पर बैठना चाहिये । खाली पेट रहना उपयोगी है । स्नान के पश्चात् प्रातःकाल इसकी साधना अच्छी होती है । इस आसन से चपटे भर तक चाहे बैठ सकते हैं, कोई त्राति की सम्भावना नहीं ।

बाँये पैर की पड़ी गुदा और इन्द्री के बीच में और दाये पैर की एड़ बाँये पैर पर लिङ्गोन्द्रिय के ऊपर रखनी चाहिये । सिर को सीधे, उड़ी-को मुका कर तथा आँखों को सामने करके कमर बिना मुकाये सीधे बैठ जाओ । शुरु शुरु में इसका अभ्यास करने में कुछ कठिनाई मात्स्य होगी । पर थोड़े दिनों के अभ्यास से ही यह साधा जा सकता है । जब कभी काम-विकार हृदय में पैदा हो, उसी समय यह आसन लगा कर बैठ जाना चाहिये और हृदय में परमात्मा का ध्यान कर अपने काम-विकार को धिक्कारना चाहिये । फिर देखिये आप के चित्त पर कैसा उत्तम प्रभाव होता है ।

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