भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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प्रहसचर्य-विधान

( ३२ ) श्रीपौसन

सिर के बल पर जो आसन साधा जाय, उसे 'श्रीपौसन' व है। वास्तव में यह आसन सव आसनों में राजा के समान यह आसन योगियों के लिये विरोध रूप से उपयोगी है। सं गृहस्थ भी इसे कर सकते हैं, पर एक बात अवश्य है कि आसन के करने में असावधानी हो जाने से हानि भी हो स है। इस आसन की साधना में खान-पान तथा नियम पालन आवश्यकता होती है। बहुत निर्बलता और रोग की अवस्थ यह आसन न करना चाहिये।

इस आसन के करने में सारे शरीर का रक्त दौड़कर मरि में एकत्र होता है और समस्त रक्त-वाहिनी नाड़ियों को करना पड़ता है। अभ्यास बढ़ जाने पर नित्य अधिक से आँ चौथाई घण्टा तक करना हितकर होता है।

किसी भाँत के पास कपड़े की छोटी गद्दी बिछा कर अ सिर को उस पर नीचे रख कर और दोनों हथेली को सिंग मिलाकर, दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर को उस भाँत पर रख चाहिये। फिर दोनों पैरों को सटाकर ऊपर की ओर सिर बिल कुल सीध में जितने समय तक ठहर सकें, ठहरना चाहि कई दिनों में इसका अभ्यास हो जाने पर बिना भाँत के स भी किया जा सकता है।

आसनों का अभ्यास कर लेने पर थोड़ी देर तक आराम लेना चाहिये। उत्तम तो यह हो कि किसी आसन जानने के पास कुछ दिन रह कर अभ्यास कर लेना चाहिये।