भारतकोश
संग्रह पर लौटें

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

मूलचर्य-विधान

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वन जाता है। मूलचर्य का पालन करनेवाले के लिये व्याप बड़ा ही उपयोगी होता है।

व्यायाम दो बार किया जा सकता है। यदि न हो सके, एक बार सबेरे तो अवश्य ही करना चाहिये। व्यायाम के पश्च योड़ी देर ठहर कर कुछ जलपान कर लेना चाहिये।

(१) दैनिक व्यायाम से मन शान्त और सदा प्रसन्न रह है। (२) कठिन से कठिन कार्य सरल प्राप्त होते हैं। (३) इन्द्र के दमन की शक्ति मिलती है। (४) विषय-भोगों में निर्लिप्त होती है। तथा (५) अनेक शारीरिक और मानसिक दुःख दूर होते हैं।

(३१) आसनों का अभ्यास

योग-शास्त्र में आसन भी योग का एक अङ्ग माना गया है इसे एक प्रकार का व्यायाम भी कह सकते हैं। शरीर के लिये यह अत्यन्त उपयोगी है ही, पर इससे मानसिक लाभ भी बढ़ होता है। जब तक आसन स्थिर नहीं होता, मन की चञ्चलता जा नहीं। अनस्थिरता के कारण भी मन में विषय-वासनायें जाग ही उठती हैं। कुछ आसन ऐसे हैं, जिनसे वीर्य-रक्षा तथा इन्द्र दमन में बड़ी सहायता मिलती है। यही कारण है कि योगी-लं आसन के प्रायः अभ्यासी होते हैं।

सीधे बैठना, सीधे चलना आदि भी आसनों के अङ्ग हैं, आजकल हम देखते हैं प्रायः लोग इस ओर ध्यान ही नहीं देते इससे उनको स्नायविक व्यास-प्रत्यास-क्रिया ( जो शरीर

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जीर्ण-न्दा के सन्निधम

नीरोग रखने के लिये घड़ी आवश्यक है ) वचित रूप से नहीं होती । इससे जीवन्ती-शक्ति घटती और रोग बढ़ता है ।

हमारे विचार से आसनों में 'सिद्धान्त' सब साधारण के लिये न्यत्यन्त उपयोगी है । इससे किसी प्रकार की किसी को हानि नहीं हो सकती । यह सरल भी है । इसकी अपेक्षा दूसरे आसन क्रिष्टसाध्य तथा देश, काल और वल का विचार रख कर किये जा सकते हैं । उनमें जरा भी त्रुटि होने से शारीरिक तथा मानसिक हानि होने की भी सम्भावना है ।

इस आसन को करते समय समश्रुंभ पर बैठना चाहिये । खाली पेट रहना उपयोगी है । स्नान के पश्चात् प्रातःकाल इसकी साधना अच्छी होती है । इस आसन से चपटे भर तक चाहे बैठ सकते हैं, कोई त्राति की सम्भावना नहीं ।

बाँये पैर की पड़ी गुदा और इन्द्री के बीच में और दाये पैर की एड़ बाँये पैर पर लिङ्गोन्द्रिय के ऊपर रखनी चाहिये । सिर को सीधे, उड़ी-को मुका कर तथा आँखों को सामने करके कमर बिना मुकाये सीधे बैठ जाओ । शुरु शुरु में इसका अभ्यास करने में कुछ कठिनाई मात्स्य होगी । पर थोड़े दिनों के अभ्यास से ही यह साधा जा सकता है । जब कभी काम-विकार हृदय में पैदा हो, उसी समय यह आसन लगा कर बैठ जाना चाहिये और हृदय में परमात्मा का ध्यान कर अपने काम-विकार को धिक्कारना चाहिये । फिर देखिये आप के चित्त पर कैसा उत्तम प्रभाव होता है ।

प्रहसचर्य-विधान

( ३२ ) श्रीपौसन

सिर के बल पर जो आसन साधा जाय, उसे 'श्रीपौसन' व है। वास्तव में यह आसन सव आसनों में राजा के समान यह आसन योगियों के लिये विरोध रूप से उपयोगी है। सं गृहस्थ भी इसे कर सकते हैं, पर एक बात अवश्य है कि आसन के करने में असावधानी हो जाने से हानि भी हो स है। इस आसन की साधना में खान-पान तथा नियम पालन आवश्यकता होती है। बहुत निर्बलता और रोग की अवस्थ यह आसन न करना चाहिये।

इस आसन के करने में सारे शरीर का रक्त दौड़कर मरि में एकत्र होता है और समस्त रक्त-वाहिनी नाड़ियों को करना पड़ता है। अभ्यास बढ़ जाने पर नित्य अधिक से आँ चौथाई घण्टा तक करना हितकर होता है।

किसी भाँत के पास कपड़े की छोटी गद्दी बिछा कर अ सिर को उस पर नीचे रख कर और दोनों हथेली को सिंग मिलाकर, दोनों पैरों को धीरे-धीरे ऊपर को उस भाँत पर रख चाहिये। फिर दोनों पैरों को सटाकर ऊपर की ओर सिर बिल कुल सीध में जितने समय तक ठहर सकें, ठहरना चाहि कई दिनों में इसका अभ्यास हो जाने पर बिना भाँत के स भी किया जा सकता है।

आसनों का अभ्यास कर लेने पर थोड़ी देर तक आराम लेना चाहिये। उत्तम तो यह हो कि किसी आसन जानने के पास कुछ दिन रह कर अभ्यास कर लेना चाहिये।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधम

शीर्षसन से नीचे लिम्बे लाभ होते हैं :—

( १ ) शीर्षसन के करने से दूषित रक्त भी शुद्ध हो जाता है। ( २ ) मेषा-शक्ति बढ़ती है। ( ३ ) रोगों से मुक्ति मिलती है। ( ४ ) स्वास्थ्य में अपूर्व परिर्वर्त्तन दिखाई पड़ता है। एवं ( ५ ) वीर्य को शान्ति और पुष्टता प्राप्त होती है।

(३३) आडम्बर-शून्यता

आजकल पाश्चात्य सभ्यता की हवा लग जाने के कारण समाज में आडम्बर का प्रवेश हो गया है। हमारे विचारार्थीगण जिनका जीवन सादा होना चाहिये, वे भी इसके फेर में फँस गये हैं। आडम्बर करने से मनुष्य की मान-प्रतिष्ठा बढ़ जाती है, यह बात मान लेना भारी भ्रम है। सरलता और सादगी से रहना और उच्च विचार करने से ही मनुष्य संसार में सभ्य और श्रेष्ठ बन सकता है।

हमने आडम्बरों पुरुषों और स्त्रियों में प्रायः अविवेक अधिक देखा है। आडम्बर स्वयं व्यभिचार की ओर हृदय खींच ले जाता है। आडम्बर त्रिकारों का मूल है।

व्यर्थ की वस्तुएँ लेकर शरीर की सजाना और अज्ञ-प्रत्यक्ष को वेदव रखना ही आडम्बर है। ऐसे कार्य करने वाले मूर्ख, दुराचारी और अविवेकी होते हैं। इसलिये जो लोग ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहते हों, वे अवश्य अपने को नाना प्रकार के दिखावटी आडम्बरों से दूर रखें। इसी में उनकी वास्तविक कल्याण है।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

इस देश के प्राचीन निवासी प्रायः आहम्बर से घृणा कते थे। उन्होंने कभी अपने को उसका गुलाम नहीं बनाया। कारण था कि वे लोग बुद्धिमान, वीर और ऐश्वर्यवान होते। उनका समय और परिश्रम व्यर्थ आहम्बर में नहीं लपाता था।

(३४) मातृ-भाव

मातृवत् परदारेणु, परद्रव्येषु लोघ्वत्।

आत्मवत्सत्वं भूतेषु यः पश्यति स पण्डितः ॥

( सृष्टि

जो पराई खी को माता के सहस्र, पराये धन को ढेले समान और दूसरे को अपने तुल्य समझे, वह विद्वान् है।

सब के उपकारों का कुछ बदला दिया जा सकता है, पर पू माता के उपकारों का नहीं। मातृ-भाव की महान्ता शब्दों में नहीं ब साई जा सकती है। माता के प्रति किसी भी कुभावना नहीं होती। य संसार की क्षियों को माता मान लें, तो फिर हृदय में काम कुछ विकार उठ नहीं सकता। इसलिये ब्रह्मचर्य के प्रेमी को मा भाव को मन, वच तथा कर्म से धपाना चाहिये। अपनी अब से बड़ी जितनी स्त्रियाँ हैं, उन्हें माता जानना उन्हें आदर-सुख शब्दों से सम्बोधित करना और उनका भय मन में रखना चाहिये। वीर्य-रक्षा का यह सर्वोत्कृष्ट उपाय है।

श्रीराम ने वीर लक्ष्मण को सीताजी के गहने दिखाए

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चौर्य-रक्षा के सविनयम

पूछा कि तुम इन्हें पहचानते हो कि ये किस के हैं ? इस पर चढ़ोने क्या कहा:—

नाहं जानामि कैयूरे, नाहं जानामि कुण्डले ।

नृपुरे त्वमिजानामि, त्वि्य पाशमि वन्दनात् ॥

( कल्मीकि रामायण )

न तो मैं कंकणों को जानता हूँ और न कुण्डलों को ही। पर हूँ, मैं दोनों पाजेव को पहचानता हूँ। क्योंकि मैं त्वि्य जानकी जी के पैरों पर मुक्त कर प्रणाम करता था।

धन्य हो लक्ष्मण, धन्य ! इसी का नाम मातृ-भाव है ! इससे ब्रह्मचर्य की रक्षा क्यों न की जा सके ?

परमईश्वर रामकृष्ण तो सारे संसार को ही मातृमय मान कर उपासना करते थे। इस प्रकार चढ़ोने अपना सारा जीवन अखण्ड ब्रह्मचर्य में वितताया।

एक साध्वी स्त्री स्वामी दयानन्द जी के पास आई, और कहा कि भगवन्, मैं आजाल ब्रह्मचारिणी हूँ, और आप भी एक आदर्श ब्रह्मचारी हैं। यदि आप मुक्त से विवाह कर लें, तो मेरे गर्भ से आप जैसा ही दिग्विजयी विद्वान और लोकोंपकारी पुत्र उत्पन्न होगा। इस पर स्वामीजी ने कहा 'हे माता तुम मुझे ही क्यों नहीं अपना पुत्र मान लेतीं ? यह उत्तर पाकर वह लज्जित हो गई।

( ३५ ) भगिनी-भाव

भगिनी-भाव में भी बड़ी पवित्रता है। उसकी भावना से हृदय की दुर्बोसना तत्क्षय शान्त हो जाती है।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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माता की पुत्री को भगिनी कहते हैं। यह भी माता के पक्ष आदरणीया समझी जाती है। इसके प्रति भी हृदय में दुःख नही होती। ब्रह्मचर्य-पाठन में भगिनी-भाव से भी अच्छी सत् यत्ता मिलती है। जो रित्रियाँ समान वय वाली हों, उन्हें भगिन रूप समझना चाहिये।

एक समय की बात है कि छत्रपति शिवाजी ने एक युव को किसी सुसलमान के हाथ से बेचाया। इस पर उसने कहा कि अब मैं आप की हो चुकी। किन्तु शिवाजी ने कहा कि मैं यह कोई उपकार का काम नहीं किया। यह तो मेरा कर्तव्य था। तुम मेरी आज से धर्म-भगिनी हुई। इस पर उस को उन्हें शतशः धन्यवाद दिये।

एक पौराणिक कथा है कि देवयानी नाम की एक परम सुन्दर कन्य नामक विद्यार्थी पर मोहित हो गई थी। वह कन्य को हृद से प्यार करती थी। उसने एक दिन कन्य से वैवाहिक प्रेम चाहा। इस पर उसने कहा कि तुम मेरे गुप्त की पुत्री होने के कारण धर्म-भगिनी हो ! प्राण रहते, मैं कदापि तुम्हें नहीं बर सकता। इस प्रकार कन्य की रक्षा हुई। अतएव समान वय वाली स्त्रियों के प्रति भगिनी-भाव रखना चाहिये।

(३६) पुत्री-भाव

पुत्री की उत्पत्ति अपने ही शरीर से होती है। उसके प्रति सदैव मनुष्य का पवित्र स्नेह होता है। उसका उपकार आजीवन लोग करते रहते हैं। इसलिये ब्रह्मचर्य-रक्षा में पुत्री-भाव भी

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जीव-रक्षा के सञ्चियम

यहुत सहायक होता है। जो खियों अपनी आयु से छोटी हैं, वे पुत्री ही हैं। उनको पुत्री वाले शब्दों से ही पुकारना चाहिये।

कई पुरतकों में यह बात पही गई है कि इस प्रकार कई खियों ने अपने सतील की रक्षा की है। शत्रुओं या दुराचारियों के अधिकार में आते ही, उन्होंने कहा कि मैं आपकी धर्म-पुत्री हूँ, जो चाहें सो करें। इस पर उन लोगों के हृदय झिल गये, और अत्याचार के लिये हाथ न उठ सके, बल्कि उन लोगों ने उन खियों को पुत्री की भाँति, उनके घर पहुँचा दिया। अतएव अपने से छोटी आयु वाली खियों के प्रति पुत्री-भाव रखना बहुत ही श्रेयस्कर है।

(३७) भाव की निर्मलता

सुचिकानां सहस्रैस्तुदकुलुम्ब शतान्यपि। न श्रुद्ध्यन्ति दुरात्मानां, येषां भावो न निर्मलः।

( दश-स्वप्नि )

जिन लोगों का भाव निर्मल ( शुद्ध ) नहीं, वे दुरात्मा हज़ारों मन भिड़ी और सैकड़ों घड़े जल से भी शुद्ध नहीं किये जा सकते।

“भावेहि विद्यते देवस्तस्माद्भावेहि कारणम् ।”

भाव में ही देवता बसते हैं, अतः भाव ही प्रधान है।

भाव ही सब कुछ है। इसी भाव के प्रभाव से लोग ईश्वर तक को प्राप्त कर लेते हैं। पर वह भाव होना चाहिये सच्चा; जिस पुरुष का भाव निर्मल है, उसे संसार ही निर्मल दिखाई पड़ता

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

है, और जिसका पापमय है, उसे सब कुछ दूषित ही ज्ञात है। क्योंकि कहा गया है:—

जाको रद्दी भावना जसी ।

प्रभु मूर्ति देखी तिन तैसी ॥

(४० रामायण)

इसलिये भाव की निर्मलता पर विशेष ध्यान देना चाहिये ब्रह्मचर्य के लिये वह नितान्त आवश्यक है। इस भाव से संस की सभी खियाँ ब्रह्मचारिणी दिखलाई पड़ेंगी और समस्त पुसदाचारी ज्ञात होंगे। फिर तो व्यभिचार के लिये कोई कारण ही न मिल सकेगा। जिसके भाव में निर्मलता है, वह औरों हृदय को भी बदल सकता है। जैसे, चन्दन जिस वन में रह है, अपनी सुगन्धि से और वृक्षों को भी सुगन्धित कर देता है अतएव सदा अपने हृदय में शुद्ध भावों को स्थान देना चाहिये और तुरे विचारों के आते ही भगवद्भजन या महात्माओं उपदेशों का स्मरण करना चाहिये।

( ३८ ) ज्ञानेन्द्रियों पर संयम

‘वृत्तीन्द्रियाणां पञ्चैव; शब्दाद्या विषया मताः।’

ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं, और शब्दादि इनके पाँच विषय माने गये हैं।

ये इन्द्रियाँ, जिनके द्वारा अन्तरात्मा को पदार्थों का ज्ञान होता है, ज्ञानेन्द्रियाँ कहलाती हैं। ये पाँच हैं। कान, त्वचा, नेत्र जीभ और नाक। शब्द, रूप, रूप, रस और गन्ध, ये पाँच क्रम से उनके विषय हैं।

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वीर्य रक्षा के सल्लिख्य

श्री भगवद्गीता में लिखा है कि यदि समस्त इन्द्रियों में किसी एक इन्द्रिय का भी द्वार खुला रह जाय, तो मनुष्य की सुदृष्टि इस प्रकार नष्ट होने लगती है जिस प्रकार कि मशक (पानी का थैला) में एक छिद्र हो जाने से सारा पानी उस में का बह जाता है।

वीर्य-नाश से बचने के लिये ज्ञानेन्द्रियों पर अधिकार जमा लेना अत्यन्त उपयोगी है। वे लोग कभी जहाजचर्च का पालन नहीं कर सकते, जिनकी ज्ञानेन्द्रियाँ अपने अपने विषयों में स्वतन्त्र हो कर विचरण करती हैं।

अब हम इनके संयम के लिये कुछ उपाय बतलाते हैं:—

शब्द का महग्न कान से होता है। जैसे शब्द कान में पड़ते हैं, वैसा ही हृदय पर प्रभाव होता है। इसलिये कानों से किसी प्रकार के अश्लील शब्द न सुनने चाहियें। न्यभिचार की कथा, दूषित भाव उत्पन्न करने वाली बात और आत्मोत्साह को हीन करने वाली युक्तियों के सुनते सुनते यह इन्द्रिय वश के बाहर हो जाती है। इसे वश में करने के लिये सदुपदेश और वेद-मन्त्रों के घोष को सुनना चाहिये।

स्पर्श का अनुभव त्वचा से होता है। जैसी वस्तु त्वचा से छूई जाती है, वैसी ही रुचि उत्पन्न होती है। इसलिये इससे कोई ऐसी वस्तु न छूनी चाहिये, जिससे काम-वासना को सहायता मिले। जैसे, कोमल शय्या पर शयन करना, तरुणों की का कर-स्पर्श करना और शरीर पर सुन्दर-सुखद वस्त्र धारण करना। इन कार्यों से यह इन्द्रिय वशवर्तिनी नहीं रह सकती। अब: इस के विपरीत कार्य करने में ही हित है।

ऋक्षचर्य-विधान

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रूप का ज्ञान आँखों से होता है । यह इन्द्रिय भी बड़ी बचती है । चार-चार युवती की पर दृष्टिपात करने, अस्लील नात देखने, नम्र स्त्रियों के चित्रों को निहारने और पशु-पक्षियों की क्रीविलोकने से यह इन्द्रिय स्वतन्त्र हो जाती है । इसलिये अपने वश में करने के लिये ईश्वरीय सृष्टि, प्राकृतिक सुन्दर और दिव्य मूर्तियों के देखने का अभ्यास करना चाहिये ।

रसका आनन्द जीभ से लिया जाता है । यह सर्वत्र सपदार्थों पर दौड़ती है । अधिक मीठे, अधिक तीते, अधिक ख़ाथिक चिकने और अधिक कड़वे पदार्थों के सेवन से यह विग जाती है । इसे वश में करने के लिये यह उपाय है कि यह चाहे, उसे देवे ही नहीं । मिठाईयों का रस लेना चाहे, तो इस चने चबवाना चाहिये । इस प्रकार इसकी लोलुपता कम जायगी । इसे बही और छतना ही पदार्थ सेवन के लिये दे चाहिये, जितने से स्वास्थ्य और ऋक्षचर्य बना रहे ।

गन्ध का अनुभव नाक से होता है । इसे दुर्गन्धित वस्तुओं के सँघने से बचाना चाहिये । कामोत्पादक सुगन्धित पदार्थों से इसे न देना ही ठीक है । इससे स्वास्थ्यप्रद वायु और दूर फूलों की सुगन्धि ही लेनी चाहिये । इसे भी सर्वत्र वश में रख आवश्यक है ।

ज्ञानेन्द्रियों के संयम से मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर सपर अधिकार प्राप्त होता है । और सत्कर्त्तव्यों का पालन हो सकता है । तथा योग की सिद्धि भी हा सकती है ।

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वीर्य-रत्ना के सन्निधमः

(३६) ब्रह्मचारियों की चर्चा

वेदास्त्यागश्च यथाश्च, नियमाश्च तर्पासि च । न विप्रदुष्टभावन्य, सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ।

( मनुस्मृति )

जो द्रष्टाचारी अजितेन्द्रिय पुरुष है, उसके वैद, त्याग, यज्ञ, नियम तथा तप या दूसरे कोई कार्य सिद्धि को प्राप्त नहीं होते ।

वीर्य-रत्ना के लिये ब्रह्मचारियों की चर्चा बहुत हितकारिणी होती है । ऐसी चर्चा करने या सुनने से ब्रह्मचर्य के प्रति सच्ची श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है और आत्मिक साहस पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ जाता है । जब यह बात ज्ञात होती है कि असुक्रम-चारी ने इस इस प्रकार के कार्य किये, तथा इस इस उपाय से अपनी वीर्य-रत्ना की, तो हृदय में यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि हम भी उनके अनुकरण से अपने को संयमी बना सकते । यह कोई कठिन काम नहीं है । वे भी तो हमारे जैसे मनुष्य ही थे ?

संसार में आज तक प्रायः जितने सत्कर्म हुये हैं, उनमें ब्रह्मचारियों का विशेष हाथ रहा है । मनुष्य जाति पर उनके परोपकार का अद्वैत श्रेष्ठ लक्षण हुआ है । ब्रह्मचर्य का पालन करने से ही उस श्रेष्ठ का कुछ सूद दिया जा सकता है । अतः श्रेष्ठ श्री-पुरुष को चाहिये कि उन लोगों के दिव्य चरित्र की चर्चा करें, और भरतक उनके आदर्शों पर चल कर ब्रह्मचर्य रूपी अमृत पीकट अपने हृदय को दृप्त करें ।

मत्स्यचर्य विधान

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( ४० ) मृत्यु-भय

अजराम्बलालो, विद्यामर्थञ्च चिन्तयेत् । युहीत इव कैशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥

( नीतिशास्त्र )

बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि अपने को अजर-अमर समझ कर विश्वास और धन का संग्रह करें। किन्तु धर्म इस प्रकार करता रहे कि जैसे मृत्यु उसके शीर्ष पर नाच रही हो।

यह सभी लोग जानते हैं कि जिसका जन्म होता है, एक न एक दिन वह मरता भी अवश्य है। भगवान् राम तथा श्री कृष्ण जैसे जयवती पुरुषों को भी मर जाना न नहीं छोड़ा, फिर साधारण लोगों की तो बात ही क्या !

मृत्यु का भय मित्सिंदह सभी भयों के भारी होता है। जो किसी से न डरता हो, वह मृत्यु के नाम से डर जाता है। इस लिये जब हृदय में काम-विकार उत्पन्न हो, तब मृत्यु के विषय की चिन्ता कर भयभीत हो जाने से वीर्य-रक्षा हो सकती है। उस समय यह सोचना चाहिये कि मृत्यु से बचना कठिन है। फिर किस दिन के लिये इन्द्रिय-सुखों में पड़ कर मांष कर्ह ! ब्रह्मचर्य के पालन से मृत्यु के दिन दूर किये जा सकते हैं पर वीर्य-नाश से वह बहुत समीप आ जाती है। अतएव मैं वही उपाय कहूँगा, जिससे मैं अधिक दिनों तक इस संसार में जी सकूँ। और मृत्यु के सुख में पहुँने वाला कष्ट शीघ्र ही न अनुभव कर्ह !

मृत्यु-भय से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—

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वीर्य-रत्ना के सखियम

(१) मृत्यु-भय से मनुष्य कभी आलसी और अनुत्साही नहीं हो पाता। (२) सदैव पुरण और परोपकार में लग्न रहता है। (३) किसी को कष्ट देने या दुःखजन कहने का साहस नहीं करता तथा (४) सद्बुध्यवहार और धार्मिक कार्यों में रत रहता है।

(४१) व्यसन-त्याग

व्यसन शिंखा के असाव तथा पाश्र्चात्य सम्प्रदाय के प्रभाव से इस देश में, घुरे व्यसनों का साम्राज्य सा स्थापित हो गया है। इन दुष्ब्यसनों में अबोध लोग तो पड़े ही हैं पर हमारे बहुत से विद्वान् लोग भी फैशन के फेर में पड़कर इसके भक्त हो गये हैं। बीड़ी, सिगरेट पान सम्बद्ध, संग्रह तो इनका नित्य का भोजन सा हो गया है। दुष्ब्यसनों का शरीर और आत्मा पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है; दुष्ब्यसनी लोग कभी न्यभिचार से नहीं बच सकते।

मादक द्रव्य सेवन करने से रक्त में एक प्रकार की अस्वाभाविक उत्तेजना होती है। शुरू शुरू में तो मनुष्य को फुरसी सी मादम होता है पर अन्त में उसका परिणाम बड़ा भयंकर होता है। रक्त में अस्वाभाविक उत्तेजना से कीर्त्य पतला पड़ जाता है, पिच विगड़ जाता है, आंखों की ज्योति क्षीण हो जाती है, छाती दिमाग और दिल कमजोर हो जाते हैं अन्त में स्त्री और दूमे के रोग इतने पीछे लग जाते हैं कि मनुष्य को मार कर ही छोड़ते हैं। कई लोग बीड़ी सिगरेट आदि को पाखाने साफ्

ग्रहणचर्य-विज्ञान

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होने और बात-विचार दूर होने की दवा समझले हैं। पर यह उनका भ्रम है। इससे उनकी आँखें कमजोर हो जाती हैं और धीरे-धीरे वे उसके ऐसे गुलाम हो जाते हैं कि बिना चीड़ी सिंग-रेट के उनका पाखाना ही नहीं उतर सकता। यही हाल गांजा भाँग शराब अफीम आदि का है। अतएव जो लोग अपनी उन्नति करना चाहें, उन्हें कदापि इन दुष्प्रसनों के फँर में न पड़ना चाहिये।

प्राचीन समय में धार्मिक शिक्षा के प्रभाव से बहुत ही कम लोग दुष्प्रसनों में फँसते थे।

जो लोग दुष्प्रसनी थे भी, वे राक्षस और स्लेरूछु कहे जाते थे। पर हाय ! आज उसी आर्य-जाति में राक्षसी कार्य के करने वाले सौ में पञ्चानवे हो गये हैं। जो दुष्प्रसन में पड़ा है, वह कभी वीर्य-रक्षा में सफल मनोरथ नहीं हो सकता। छोटे से छोटा दुष्प्रसन भी वीर्य-नाश का बड़ा कारण बन जाता है।

सभ्य और शिक्षित देशों में अब इन मादक द्रव्यों का प्रचार कम होता जाता है। कई देशों में तो इसके लिये कड़े कानून बना दिये गये हैं। चीन और जापान देश की दशा देख लीजिये। चीन में अफीम का प्रचार होने से उसकी कैंसी दुर्दशा हो रही है और जापान में इनके लिये कानूनन रोक होने से उसकी कितनी उन्नति हो रही है यह आप प्रत्यक्ष देख सकते हैं।

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चौथ-रत्ना के सन्निधम्

( ४२ ) उपवास-व्रत

आहारान् पञ्चति शिखी, दोपात्रं आहारं वर्जितः ।

अत्रि से अहार पचना है और उपवास से, दोप पचते हैं ।

हमारे हिंदूधर्म-शास्त्रों में उपवास का बहुत महत्व लिखा है । उपवास से शरीर, मन और आत्मा सब ही को उन्नति होती है । शरीर में दोषों के बद्ध जाने से इंद्रियों का वेग बद्ध जाता है और मन काव्यू से बाहर होने लगता है । उपवास से सब दोष नष्ट हो जाते हैं और शरीर स्वस्थ और हल्का सा साझम होता है । अंग्रेषी में कहावत है—Sound body, sound mind. अर्थात् स्वस्थ शरीर के कारण मन भी चंगा रहता है ।

धर्म-शास्त्रों में एकादशी, चतुर्दशी, शिवरात्रि आदि कई तिथियों के दिन उपवास करने की आज्ञा है । धार्मिक महत्व के कारण बहुत से लोग इनका पालन भी करते हैं । पर उपवास के रहस्य को न जानने के कारण लोग उपवास के पहले दिन पेट भर कर खब मिष्ठान आदि पदार्थ खा लेते हैं । कई लोग फलाहार भी उपवास करते हैं और उसमें भी ऐसे ही गुरुपदार्थ खाते हैं । ऐसे नामधारी उपवास से तो न करना ही उत्तम है । वास्तव में उपवास के दिन कुछ भी न खाना चाहिये । दूसरे दिन बहुत हलकी चीज खानी चाहिये ।

चौथ-रत्ना में उपवास से बड़ी सहायता मिलती है । त्रिष-बाधें भी इसकी सहायता से अपनी इंद्रियों को बंधा में रख सकती हैं । उपवास का दिन हँसी मन्त्रक या खेल-तमाशे आदि में न खोना चाहिये, बल्कि वह दिन भगवद्भजन, उत्तम ग्रंथों का पठन व

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महात्म्य-विज्ञान

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श्रवण आदि शुभ कर्मों में व्यतीत करना चाहिये । इस तरह के उपवास से ही वास्तव में शारीरिक और मानसिक लाभ हो सकता है अन्यथा नहीं ।

( ४३ ) ईशा-प्रार्थना

“ईश्वरः सर्वभूतानां, हृदयेऽर्जुन तिष्ठति ।”

( श्रीकृष्ण )

हे अर्जुन ! परमेश्वर सब प्राणियों के हृदय में वास करता है ।

परमेश्वर की सत्ता सब से परे मानी गई है । उसी के जानने के लिये ऋषियों ने अनेक उपाय बतलाये हैं । उसी के पाने के लिये वेदादि सद्ग्रन्थों में ज्ञान और उपासना की शक्तियाँ बताई गई हैं ।

जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, वसी को परमात्म-तत्व का बोध हो सकता है । इसी के लिये हमारे पूर्वज ऋषि लोग दिव्य-दृष्टि पाने का प्रयत्न करते थे । उत्तमोत्तम स्तुतियों से ईश्वर की उपासना कर अपने चित्त को निर्मल बनाते थे । उनकी प्रार्थना-विधि बड़े महत्व की थी । इसके चल से वे अपने सदाचार की रक्षा करते थे । वास्तव में जो लोग भगवान् के भक्त हैं, उनके हृदय में काम-विकार नहीं बसता । ब्रह्मचर्य के पालन के लिये परमेश्वर की प्रार्थना बहुत ही उपयोगी है । मन को संयमी और अविकारी बनाने के लिये सदा पवित्र शब्दों वाली भगवान् की प्रार्थनाएँ करनी चाहिये ।

प्रार्थनाओं का प्रभाव हमारे अन्तःकरण पर बहुत उत्तम

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वीर्य-रक्षा के सन्धियम

पड़ता है। जो प्रार्थना सच्चे हृदय से और सत्कर्म के लिये की जाती है, वह अवश्य सफल होती है। नश्र और सदाचारी पुरुषों का मन घुरी भावनाओं से छूट कर पवित्र सत्कर्मों की ओर जाता है। वे इसका सदैव आदर करते हैं।

अतएव जो लोग दिन प्रति दिन अपने ब्रह्मचर्य की व्रतति चाहते हों, उन्हें प्रविद्धि तत्त्वज्ञान होकर परमात्मा का स्मरण करना चाहिये और गद्गद् होकर भगवान् से प्रार्थना करना चाहिये:—

हे प्रभो आप श्रन्तयार्थी हो। मेरे दुर्गुण आप ले लिये नहीं हैं। मुझे ऐसा वल दो कि जिससे मैं सदाचारी बन्धु—सत्यनिष्ठ बन्धु—और संसार के मोह-भाया-जाल से छूट कर आप में लीन हो जाऊँ। हे नाथ, वह दिन सब श्रायगा, जित रोज मेरा चित्त पात-दिन आप के ध्यान में हो मग्न रहेगा, मेरे कान सदा आप के गुणों को सुनते रहेंगे, मेरी जिहा से सदा सत्य और भीते वचन निकलेंगे, मेरे हाथ सदा दान देने में और सेवा करने में लगे रहेंगे; मेरा तन, मन, चन और सर्वस्व दीन-दुखियों के दुख दूर करने और उनकी सेवा में काम श्रावेगा। हे नाथ आओ, आओ। मुझे अपनी शरण में लो और सुमार्ग से दूर कर सुमार्ग को और ले चलो।

ऊपर 'वीर्य-रक्षा' के लिये हुये सन्धियम वक्ताने गये हैं। इनके अतिरिक्त 'बञ्जोली-मुद्रा-साधन' और 'कुण्डलिनी-धर्प' नाम के दो बहु-पाय ऐसे भी हैं, जिनके सिद्ध होने से वीर्य का एक यिनदु भी व्यर्थ नहीं जा सकता। पर वे परम क्लिष्ट और मरुद्वर होने के कारण योगियों के ही योग्य हैं।

ब्रह्मचर्य-विज्ञान

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३—ब्रह्मचर्य पर स्वदेशी और विदेशी विद्वान्

( भगवान् शङ्कराचार्य )

में जीवन-पर्यन्त ब्रह्मचारी रह कर भूमण्डल में वेदों का प्रचार करेंगा। मेरी समस्त शक्ति अवैदिकता ( पाखण्ड ) के खण्डन में लगेगी। मुझे विद्यास है कि ब्रह्मचर्य की सहायता से मनुष्य को सब कुछ सुलभ हो सकता है।

प्रिय शिष्यों, आत्म-विजय ही ब्रह्मचर्य का मूल है। ब्रह्मचर्य की अखण्डता से परमात्मा का सहज में लाभ होता है।

(स्वामी रामतीर्थ)

इन्द्रियों के विषय ( भोग-विलास ) में सुख को मत ढूंढें ! हे इन्द्रियों के दास ! अपनी इस सुख की निष्फल और बाहरी खोज को छोड़ दो ! अमरत्व का महासागर तुम्हारे भीतर है। स्वर्ग का राज्य तुम्हारे ही भीतर है। वह सब ब्रह्मचर्य से ही सप्य सकता है।

जैसे दीपक में तेल, वस्ती द्वारा ऊपर को चढ़ता हुआ प्रकाश के रूप में बदल जाता है, वैसे ही वह शक्ति (वीर्य) जिसका कि नीचे की ओर बहाव है, यदि ऊपर की ओर जाये लगे, अर्थात् ऊर्ध्वरेतस (ब्रह्मचारी) बन जाय, तो आकर्षण वाली शक्ति, पूर्ण तेज तथा परमान्दु में बदल सकती है।

हनुमान का नाम लेने और ध्यान करने से लोगों में ह्रदय-

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विद्वानों के मत

बीरता क्यों आती है ? इन्हें महानवीर किसने बनाया ? इसी प्रश्न- चर्चे में !

ॐ ॐ ॐ

( स्वामी विवेकानन्द )

वीर्य ही साधुता है । दुर्बलता पाप है । दत्तवान् और वीर्य- वान बनने की चेष्टा करो ! छपनिपर्व के वलप्रह, आशोकप्रह और दिव्य दर्शन-शास्त्रों का अवलम्बन करो ! अन्य दुर्बलता बढ़ाने वाले विषयों को छोड़ो !

हमें ऐसे प्रसन्नचारी मनुष्य चाहिये, जिनके शरीर की नसें लोहे की भाँति और न्मातृ दुस्पात की तरह दृढ़ हों । उनको देह में ऐसा मन हा, जिसका समुद्रन वज्र से हुआ हो । हमें चाहिये पराक्रम, मनुष्यत्व, चाडवीर्य और प्रसन्नचै !

ॐ ॐ ॐ

( स्वामी नित्यानन्द )

प्रसन्नचर्य-रत्ना के लिये प्रति समय प्रयत्न करना चाहिये । वीर्य से ही आत्मा (जीव) अमरत्व को प्राप्त होता है । शरीर की संयम और सुयोग्य बनाने के लिये निवस समय तक प्रत्येक खी-तुख को प्रसन्नचर्य धारण करना चाहिये ।

ॐ ॐ ॐ

( लोकमान्य तिलक )

में विद्याधियों और तुषकों से यही कहता हूँ कि वे प्रसन्नचर्य और वस की उपासना करें । विना शक्ति और दुष्टि के अपने