ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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चौथ-रत्ना के सन्निधम्
( ४२ ) उपवास-व्रत
आहारान् पञ्चति शिखी, दोपात्रं आहारं वर्जितः ।
अत्रि से अहार पचना है और उपवास से, दोप पचते हैं ।
हमारे हिंदूधर्म-शास्त्रों में उपवास का बहुत महत्व लिखा है । उपवास से शरीर, मन और आत्मा सब ही को उन्नति होती है । शरीर में दोषों के बद्ध जाने से इंद्रियों का वेग बद्ध जाता है और मन काव्यू से बाहर होने लगता है । उपवास से सब दोष नष्ट हो जाते हैं और शरीर स्वस्थ और हल्का सा साझम होता है । अंग्रेषी में कहावत है—Sound body, sound mind. अर्थात् स्वस्थ शरीर के कारण मन भी चंगा रहता है ।
धर्म-शास्त्रों में एकादशी, चतुर्दशी, शिवरात्रि आदि कई तिथियों के दिन उपवास करने की आज्ञा है । धार्मिक महत्व के कारण बहुत से लोग इनका पालन भी करते हैं । पर उपवास के रहस्य को न जानने के कारण लोग उपवास के पहले दिन पेट भर कर खब मिष्ठान आदि पदार्थ खा लेते हैं । कई लोग फलाहार भी उपवास करते हैं और उसमें भी ऐसे ही गुरुपदार्थ खाते हैं । ऐसे नामधारी उपवास से तो न करना ही उत्तम है । वास्तव में उपवास के दिन कुछ भी न खाना चाहिये । दूसरे दिन बहुत हलकी चीज खानी चाहिये ।
चौथ-रत्ना में उपवास से बड़ी सहायता मिलती है । त्रिष-बाधें भी इसकी सहायता से अपनी इंद्रियों को बंधा में रख सकती हैं । उपवास का दिन हँसी मन्त्रक या खेल-तमाशे आदि में न खोना चाहिये, बल्कि वह दिन भगवद्भजन, उत्तम ग्रंथों का पठन व
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