ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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होने और बात-विचार दूर होने की दवा समझले हैं। पर यह उनका भ्रम है। इससे उनकी आँखें कमजोर हो जाती हैं और धीरे-धीरे वे उसके ऐसे गुलाम हो जाते हैं कि बिना चीड़ी सिंग-रेट के उनका पाखाना ही नहीं उतर सकता। यही हाल गांजा भाँग शराब अफीम आदि का है। अतएव जो लोग अपनी उन्नति करना चाहें, उन्हें कदापि इन दुष्प्रसनों के फँर में न पड़ना चाहिये।
प्राचीन समय में धार्मिक शिक्षा के प्रभाव से बहुत ही कम लोग दुष्प्रसनों में फँसते थे।
जो लोग दुष्प्रसनी थे भी, वे राक्षस और स्लेरूछु कहे जाते थे। पर हाय ! आज उसी आर्य-जाति में राक्षसी कार्य के करने वाले सौ में पञ्चानवे हो गये हैं। जो दुष्प्रसन में पड़ा है, वह कभी वीर्य-रक्षा में सफल मनोरथ नहीं हो सकता। छोटे से छोटा दुष्प्रसन भी वीर्य-नाश का बड़ा कारण बन जाता है।
सभ्य और शिक्षित देशों में अब इन मादक द्रव्यों का प्रचार कम होता जाता है। कई देशों में तो इसके लिये कड़े कानून बना दिये गये हैं। चीन और जापान देश की दशा देख लीजिये। चीन में अफीम का प्रचार होने से उसकी कैंसी दुर्दशा हो रही है और जापान में इनके लिये कानूनन रोक होने से उसकी कितनी उन्नति हो रही है यह आप प्रत्यक्ष देख सकते हैं।