ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-रत्ना के सखियम
(१) मृत्यु-भय से मनुष्य कभी आलसी और अनुत्साही नहीं हो पाता। (२) सदैव पुरण और परोपकार में लग्न रहता है। (३) किसी को कष्ट देने या दुःखजन कहने का साहस नहीं करता तथा (४) सद्बुध्यवहार और धार्मिक कार्यों में रत रहता है।
(४१) व्यसन-त्याग
व्यसन शिंखा के असाव तथा पाश्र्चात्य सम्प्रदाय के प्रभाव से इस देश में, घुरे व्यसनों का साम्राज्य सा स्थापित हो गया है। इन दुष्ब्यसनों में अबोध लोग तो पड़े ही हैं पर हमारे बहुत से विद्वान् लोग भी फैशन के फेर में पड़कर इसके भक्त हो गये हैं। बीड़ी, सिगरेट पान सम्बद्ध, संग्रह तो इनका नित्य का भोजन सा हो गया है। दुष्ब्यसनों का शरीर और आत्मा पर बहुत ही बुरा प्रभाव पड़ता है; दुष्ब्यसनी लोग कभी न्यभिचार से नहीं बच सकते।
मादक द्रव्य सेवन करने से रक्त में एक प्रकार की अस्वाभाविक उत्तेजना होती है। शुरू शुरू में तो मनुष्य को फुरसी सी मादम होता है पर अन्त में उसका परिणाम बड़ा भयंकर होता है। रक्त में अस्वाभाविक उत्तेजना से कीर्त्य पतला पड़ जाता है, पिच विगड़ जाता है, आंखों की ज्योति क्षीण हो जाती है, छाती दिमाग और दिल कमजोर हो जाते हैं अन्त में स्त्री और दूमे के रोग इतने पीछे लग जाते हैं कि मनुष्य को मार कर ही छोड़ते हैं। कई लोग बीड़ी सिगरेट आदि को पाखाने साफ्