ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
पृष्ठ 361, कुल 380 में से
संदर्भ में पढ़ेंमत्स्यचर्य विधान
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( ४० ) मृत्यु-भय
अजराम्बलालो, विद्यामर्थञ्च चिन्तयेत् । युहीत इव कैशेषु मृत्युना धर्ममाचरेत् ॥
( नीतिशास्त्र )
बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि अपने को अजर-अमर समझ कर विश्वास और धन का संग्रह करें। किन्तु धर्म इस प्रकार करता रहे कि जैसे मृत्यु उसके शीर्ष पर नाच रही हो।
यह सभी लोग जानते हैं कि जिसका जन्म होता है, एक न एक दिन वह मरता भी अवश्य है। भगवान् राम तथा श्री कृष्ण जैसे जयवती पुरुषों को भी मर जाना न नहीं छोड़ा, फिर साधारण लोगों की तो बात ही क्या !
मृत्यु का भय मित्सिंदह सभी भयों के भारी होता है। जो किसी से न डरता हो, वह मृत्यु के नाम से डर जाता है। इस लिये जब हृदय में काम-विकार उत्पन्न हो, तब मृत्यु के विषय की चिन्ता कर भयभीत हो जाने से वीर्य-रक्षा हो सकती है। उस समय यह सोचना चाहिये कि मृत्यु से बचना कठिन है। फिर किस दिन के लिये इन्द्रिय-सुखों में पड़ कर मांष कर्ह ! ब्रह्मचर्य के पालन से मृत्यु के दिन दूर किये जा सकते हैं पर वीर्य-नाश से वह बहुत समीप आ जाती है। अतएव मैं वही उपाय कहूँगा, जिससे मैं अधिक दिनों तक इस संसार में जी सकूँ। और मृत्यु के सुख में पहुँने वाला कष्ट शीघ्र ही न अनुभव कर्ह !
मृत्यु-भय से नीचे लिखे लाभ होते हैं:—