ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य-रत्ना के सन्निधमः
(३६) ब्रह्मचारियों की चर्चा
वेदास्त्यागश्च यथाश्च, नियमाश्च तर्पासि च । न विप्रदुष्टभावन्य, सिद्धिं गच्छन्ति कर्हिचित् ।
( मनुस्मृति )
जो द्रष्टाचारी अजितेन्द्रिय पुरुष है, उसके वैद, त्याग, यज्ञ, नियम तथा तप या दूसरे कोई कार्य सिद्धि को प्राप्त नहीं होते ।
वीर्य-रत्ना के लिये ब्रह्मचारियों की चर्चा बहुत हितकारिणी होती है । ऐसी चर्चा करने या सुनने से ब्रह्मचर्य के प्रति सच्ची श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है और आत्मिक साहस पहले की अपेक्षा अधिक बढ़ जाता है । जब यह बात ज्ञात होती है कि असुक्रम-चारी ने इस इस प्रकार के कार्य किये, तथा इस इस उपाय से अपनी वीर्य-रत्ना की, तो हृदय में यह विश्वास दृढ़ हो जाता है कि हम भी उनके अनुकरण से अपने को संयमी बना सकते । यह कोई कठिन काम नहीं है । वे भी तो हमारे जैसे मनुष्य ही थे ?
संसार में आज तक प्रायः जितने सत्कर्म हुये हैं, उनमें ब्रह्मचारियों का विशेष हाथ रहा है । मनुष्य जाति पर उनके परोपकार का अद्वैत श्रेष्ठ लक्षण हुआ है । ब्रह्मचर्य का पालन करने से ही उस श्रेष्ठ का कुछ सूद दिया जा सकता है । अतः श्रेष्ठ श्री-पुरुष को चाहिये कि उन लोगों के दिव्य चरित्र की चर्चा करें, और भरतक उनके आदर्शों पर चल कर ब्रह्मचर्य रूपी अमृत पीकट अपने हृदय को दृप्त करें ।