भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

पृष्ठ 359, कुल 380 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 359

ऋक्षचर्य-विधान

३५

रूप का ज्ञान आँखों से होता है । यह इन्द्रिय भी बड़ी बचती है । चार-चार युवती की पर दृष्टिपात करने, अस्लील नात देखने, नम्र स्त्रियों के चित्रों को निहारने और पशु-पक्षियों की क्रीविलोकने से यह इन्द्रिय स्वतन्त्र हो जाती है । इसलिये अपने वश में करने के लिये ईश्वरीय सृष्टि, प्राकृतिक सुन्दर और दिव्य मूर्तियों के देखने का अभ्यास करना चाहिये ।

रसका आनन्द जीभ से लिया जाता है । यह सर्वत्र सपदार्थों पर दौड़ती है । अधिक मीठे, अधिक तीते, अधिक ख़ाथिक चिकने और अधिक कड़वे पदार्थों के सेवन से यह विग जाती है । इसे वश में करने के लिये यह उपाय है कि यह चाहे, उसे देवे ही नहीं । मिठाईयों का रस लेना चाहे, तो इस चने चबवाना चाहिये । इस प्रकार इसकी लोलुपता कम जायगी । इसे बही और छतना ही पदार्थ सेवन के लिये दे चाहिये, जितने से स्वास्थ्य और ऋक्षचर्य बना रहे ।

गन्ध का अनुभव नाक से होता है । इसे दुर्गन्धित वस्तुओं के सँघने से बचाना चाहिये । कामोत्पादक सुगन्धित पदार्थों से इसे न देना ही ठीक है । इससे स्वास्थ्यप्रद वायु और दूर फूलों की सुगन्धि ही लेनी चाहिये । इसे भी सर्वत्र वश में रख आवश्यक है ।

ज्ञानेन्द्रियों के संयम से मन, बुद्धि, आत्मा और शरीर सपर अधिकार प्राप्त होता है । और सत्कर्त्तव्यों का पालन हो सकता है । तथा योग की सिद्धि भी हा सकती है ।

ब्रह्मचर्य विज्ञान · पृष्ठ 359, कुल 380 में से · BharatKosha