ब्रह्मचर्य विज्ञान
Brahmacharya Vigyaan
पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा
स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)
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वीर्य रक्षा के सल्लिख्य
श्री भगवद्गीता में लिखा है कि यदि समस्त इन्द्रियों में किसी एक इन्द्रिय का भी द्वार खुला रह जाय, तो मनुष्य की सुदृष्टि इस प्रकार नष्ट होने लगती है जिस प्रकार कि मशक (पानी का थैला) में एक छिद्र हो जाने से सारा पानी उस में का बह जाता है।
वीर्य-नाश से बचने के लिये ज्ञानेन्द्रियों पर अधिकार जमा लेना अत्यन्त उपयोगी है। वे लोग कभी जहाजचर्च का पालन नहीं कर सकते, जिनकी ज्ञानेन्द्रियाँ अपने अपने विषयों में स्वतन्त्र हो कर विचरण करती हैं।
अब हम इनके संयम के लिये कुछ उपाय बतलाते हैं:—
शब्द का महग्न कान से होता है। जैसे शब्द कान में पड़ते हैं, वैसा ही हृदय पर प्रभाव होता है। इसलिये कानों से किसी प्रकार के अश्लील शब्द न सुनने चाहियें। न्यभिचार की कथा, दूषित भाव उत्पन्न करने वाली बात और आत्मोत्साह को हीन करने वाली युक्तियों के सुनते सुनते यह इन्द्रिय वश के बाहर हो जाती है। इसे वश में करने के लिये सदुपदेश और वेद-मन्त्रों के घोष को सुनना चाहिये।
स्पर्श का अनुभव त्वचा से होता है। जैसी वस्तु त्वचा से छूई जाती है, वैसी ही रुचि उत्पन्न होती है। इसलिये इससे कोई ऐसी वस्तु न छूनी चाहिये, जिससे काम-वासना को सहायता मिले। जैसे, कोमल शय्या पर शयन करना, तरुणों की का कर-स्पर्श करना और शरीर पर सुन्दर-सुखद वस्त्र धारण करना। इन कार्यों से यह इन्द्रिय वशवर्तिनी नहीं रह सकती। अब: इस के विपरीत कार्य करने में ही हित है।