भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

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ब्रह्मचर्य-विज्ञान

है, और जिसका पापमय है, उसे सब कुछ दूषित ही ज्ञात है। क्योंकि कहा गया है:—

जाको रद्दी भावना जसी ।

प्रभु मूर्ति देखी तिन तैसी ॥

(४० रामायण)

इसलिये भाव की निर्मलता पर विशेष ध्यान देना चाहिये ब्रह्मचर्य के लिये वह नितान्त आवश्यक है। इस भाव से संस की सभी खियाँ ब्रह्मचारिणी दिखलाई पड़ेंगी और समस्त पुसदाचारी ज्ञात होंगे। फिर तो व्यभिचार के लिये कोई कारण ही न मिल सकेगा। जिसके भाव में निर्मलता है, वह औरों हृदय को भी बदल सकता है। जैसे, चन्दन जिस वन में रह है, अपनी सुगन्धि से और वृक्षों को भी सुगन्धित कर देता है अतएव सदा अपने हृदय में शुद्ध भावों को स्थान देना चाहिये और तुरे विचारों के आते ही भगवद्भजन या महात्माओं उपदेशों का स्मरण करना चाहिये।

( ३८ ) ज्ञानेन्द्रियों पर संयम

‘वृत्तीन्द्रियाणां पञ्चैव; शब्दाद्या विषया मताः।’

ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं, और शब्दादि इनके पाँच विषय माने गये हैं।

ये इन्द्रियाँ, जिनके द्वारा अन्तरात्मा को पदार्थों का ज्ञान होता है, ज्ञानेन्द्रियाँ कहलाती हैं। ये पाँच हैं। कान, त्वचा, नेत्र जीभ और नाक। शब्द, रूप, रूप, रस और गन्ध, ये पाँच क्रम से उनके विषय हैं।