भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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महात्म्य-विज्ञान

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श्रवण आदि शुभ कर्मों में व्यतीत करना चाहिये । इस तरह के उपवास से ही वास्तव में शारीरिक और मानसिक लाभ हो सकता है अन्यथा नहीं ।

( ४३ ) ईशा-प्रार्थना

“ईश्वरः सर्वभूतानां, हृदयेऽर्जुन तिष्ठति ।”

( श्रीकृष्ण )

हे अर्जुन ! परमेश्वर सब प्राणियों के हृदय में वास करता है ।

परमेश्वर की सत्ता सब से परे मानी गई है । उसी के जानने के लिये ऋषियों ने अनेक उपाय बतलाये हैं । उसी के पाने के लिये वेदादि सद्ग्रन्थों में ज्ञान और उपासना की शक्तियाँ बताई गई हैं ।

जिसका अन्तःकरण शुद्ध है, वसी को परमात्म-तत्व का बोध हो सकता है । इसी के लिये हमारे पूर्वज ऋषि लोग दिव्य-दृष्टि पाने का प्रयत्न करते थे । उत्तमोत्तम स्तुतियों से ईश्वर की उपासना कर अपने चित्त को निर्मल बनाते थे । उनकी प्रार्थना-विधि बड़े महत्व की थी । इसके चल से वे अपने सदाचार की रक्षा करते थे । वास्तव में जो लोग भगवान् के भक्त हैं, उनके हृदय में काम-विकार नहीं बसता । ब्रह्मचर्य के पालन के लिये परमेश्वर की प्रार्थना बहुत ही उपयोगी है । मन को संयमी और अविकारी बनाने के लिये सदा पवित्र शब्दों वाली भगवान् की प्रार्थनाएँ करनी चाहिये ।

प्रार्थनाओं का प्रभाव हमारे अन्तःकरण पर बहुत उत्तम

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