भारतकोश
ब्रह्मचर्य विज्ञान

ब्रह्मचर्य विज्ञान

Brahmacharya Vigyaan

पं. जगन्नारायणदेव शर्मा द्वारा

स्रोत: Sarvahitkari Grantha Mala · Sarvahitkari (उद्गम)

DevanagariHindipublished380 पृष्ठ

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वीर्य-रक्षा के सन्धियम

पड़ता है। जो प्रार्थना सच्चे हृदय से और सत्कर्म के लिये की जाती है, वह अवश्य सफल होती है। नश्र और सदाचारी पुरुषों का मन घुरी भावनाओं से छूट कर पवित्र सत्कर्मों की ओर जाता है। वे इसका सदैव आदर करते हैं।

अतएव जो लोग दिन प्रति दिन अपने ब्रह्मचर्य की व्रतति चाहते हों, उन्हें प्रविद्धि तत्त्वज्ञान होकर परमात्मा का स्मरण करना चाहिये और गद्गद् होकर भगवान् से प्रार्थना करना चाहिये:—

हे प्रभो आप श्रन्तयार्थी हो। मेरे दुर्गुण आप ले लिये नहीं हैं। मुझे ऐसा वल दो कि जिससे मैं सदाचारी बन्धु—सत्यनिष्ठ बन्धु—और संसार के मोह-भाया-जाल से छूट कर आप में लीन हो जाऊँ। हे नाथ, वह दिन सब श्रायगा, जित रोज मेरा चित्त पात-दिन आप के ध्यान में हो मग्न रहेगा, मेरे कान सदा आप के गुणों को सुनते रहेंगे, मेरी जिहा से सदा सत्य और भीते वचन निकलेंगे, मेरे हाथ सदा दान देने में और सेवा करने में लगे रहेंगे; मेरा तन, मन, चन और सर्वस्व दीन-दुखियों के दुख दूर करने और उनकी सेवा में काम श्रावेगा। हे नाथ आओ, आओ। मुझे अपनी शरण में लो और सुमार्ग से दूर कर सुमार्ग को और ले चलो।

ऊपर 'वीर्य-रक्षा' के लिये हुये सन्धियम वक्ताने गये हैं। इनके अतिरिक्त 'बञ्जोली-मुद्रा-साधन' और 'कुण्डलिनी-धर्प' नाम के दो बहु-पाय ऐसे भी हैं, जिनके सिद्ध होने से वीर्य का एक यिनदु भी व्यर्थ नहीं जा सकता। पर वे परम क्लिष्ट और मरुद्वर होने के कारण योगियों के ही योग्य हैं।